Saturday, March 20, 2010

उसे मैं नहीं जानता था


ज़िंदगी कब कौन सा रंग ले आए, हममें से शायद कोई नहीं जानता। यह तो ऐसी क़ि‍ताब है जि‍सका हर पन्ना पहले वाले से जुदा होता है। सबकी क़ि‍ताब अलग-अलग, सबकी कहानी अलग-अलग। अपनी क़ि‍ताब और कहानी हम नहीं जानते। बस, पढ़ते रहना ही हमारी नि‍यती है। फि‍र भी इसके कुछ रंग कभी-कभी दूसरों के रंगों से मि‍लते-जुलते होते हैं। जब-जब ऐसे रंग सामने आते हैं, एक अजीब सा जुड़ाव महसूस होता है, अपने और अनजानों के बीच। तभी तो कि‍सी बेगाने की मुस्कुराहट भी जाने-अनजाने हमारे होठों से रिश्ता बना लेती है। कभी-कभी कि‍सी के आंसुओं से हमारी आंखों में भी नमी उतर आती है। कभी कि‍सी का हार कर बैठ जाना हमें अच्छा नहीं लगता और हम कुछ कर सकें ना कर सकें, उसके कांधे पर रखने के लि‍ए हमारे हाथ में हलचल हो ही जाती है। तब हम उनके लि‍ए अनजाने नहीं रहते।
कभी-कभी अनजान लोगों के साथ चलना भी अच्छा लगता है। है ना?
अगर लगता है तो वि‍नोद कुमार शुक्ल की यह कवि‍ता भी आपको अच्छी लगेगी।

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलि‍ए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।

1 comment:

Unknown said...

yeh jo feeling hai, shayad isse zada khoobsoorat andaaz mein maine shayad ise kabhi nahi padha tha...