Monday, December 16, 2013

बात मत टालो



गड्डमड्ड है। सही है कि गलत, पता नहीं, मगर है तो सही। एक ही पल में शीतल और उसी पल में सिहरन पैदा करने वाला। मुस्कुराहट को नौंचती उदासी को क्या कहना चाहोगे?

मुस्कुराहट देखनी है तो देख लो, दिख जाएगी। मगर कुछ और मत पूछना। इस मुस्कुराहट की कोई किस्म नहीं होती। होती भी होगी तो अभी पता नहीं। पहली बार कोई मिले तो उसे पहचानने में वक्त तो लगता ही है। हां, बस इतना पता चला है कि है ये मुस्कुराहट ही।

नहीं, वो उदासी वुदासी कुछ नहीं, ऐसे ही गलती से लिखा गया। लिखा गया तो क्या जरूरी है कि मिटाया जाए। मिटाना कभी कभी अपने हाथ में होता भी नहीं। और कभी होता है तो भी जरूरी तो नहीं मिटाने का भी मूड हो। मिटनी होगी तो अपने आप मिट जाएगी।

देखो कुछ चीजें समझना आसान नहीं होता और कुछ को समझाना। कुछ चाहकर भी समझ नहीं आतीं और और कुछ चाहकर भी समझना नहीं चाहते। इसी लिए तो कहते हैं गड्डमड्ड। ये ऐसा शब्द है जिसे अपने अपने तरीके से समझा जा सकता है। ये व्याकरण से बाहर है। सबका अपना अपना है, और किसी का अपना नहीं।

चलो कुछ और बात करो। उन फूलों की बात करो जो घर के बगीचे में अभी नए खिले हैं। नागफनी के उन कांटों की नहीं, जो थे तो उसी बाग में मगर पहले कभी नजर नहीं आए। फूल को देखोगे तो बगीचा आंखों को सुहाएगा। नागफनी कभी सुहाती है क्या!

सुहाए न सुहाए, होती तो है ना।

तुमने वो नई प्रेम कहानियां पढ़ीं जो अभी अभी बाजार में नई आई हैं? 'तमन्ना तुम अब कहां हो'। नहीं पढ़ीं! पढ़ने का मन नहीं, कहकर बात मत टालो। कभी कभी पढ़कर मन बदल जाता है। हां हां, ठीक है, प्रेम कहानियों में भी अंत दुखद होते हैं, पर तुम पूरी मत पढ़ो। जब अंत होने लगे तो पढ़ना छोड़ दो।

सुनो, एक बात कहूं, नाराज तो नहीं होओगे?

ये सोचने की प्रैक्टिस करो कि सब ठीक हो जाएगा। ये बड़ी मजेदार प्रैक्टिस होती है। होना वोना कुछ हो न हो, लगने लगता है कि हो जाएगा।

बाए! टेक केअर।

Monday, August 19, 2013

अमृता का नॉवल पढऩे के बाद......




कुरुक्षेत्र में था। प्रो. कथूरिया वेस्ट लैंड पढ़ाने आए थे। तब अंग्रेजी डिपार्टमेंट के हेड थे। यूं पढ़ाया था कि लगा ईलियट का वेस्ट लैंड भी मेरा वेस्ट लैंड ही है। एक घंटे की क्लास थी। इस एक घंटे में न जाने कितने वेस्ट लैंड तब मेरे बैंच पर मेरे साथ बैठे थे। मुझे डिस्टर्ब नहीं कर रहे थे, लेकिन मैं समझ गया था कि अब नहीं क्लास के बाद डिस्टर्ब करेंगे। क्लास के बाद एक एक कर ये वेस्ट लैंड किसी जहरीली बेल की तरह मेरे हाथ, पांव, सीने, सिर से लिपटने लगे। घबराकर प्रो. कथूरिया के पास गया उनके ऑफिस में। सोचा वेस्ट लैंड के एक्सपर्ट हैं, इनसे बचना भी सिखाएंगे। बातों बातों में उन्होंने कहा... हर किसी का अपना कुरुक्षेत्र होता है। मेरा भी है। तुम्हारा भी। उम्र भर यह कुरुक्षेत्र हमारे भीतर रहेगा। लडऩा तो पड़ेगा ही। लड़ते रहना सीख लेना चाहिए।


8-9 साल हो गए उन बातों को। अब कुरुक्षेत्र की आदत पड़ चुकी है। फिर भी कभी कभी इस कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु सा अकेला रह जाने का अहसास हो ही जाता है। कभी कभी। अक्सर नहीं। दो-तीन दिन पहले अमृता प्रीतम का नॉवल कोरे कागज पढ़ते वक्त यह अहसास लौटा था। कुछ जलते हुए अक्षर अक्सर पढऩे वाले का मन सुलगा देते हैं। अमृता के ही शब्द हैं... कागज को शाप है कि वह नहीं जलता। नहीं तो न जाने कितनी किताबें अपने आप सुलग जातीं। खैर, इस कुरुक्षेत्र से निकलने के लिए अक्सर मैं अक्षरों को हथियार बनाने की कोशिश करता हूं। तब भी यही किया। मेरी लिखीं ये लाइनें अब आपके लिए....

कभी कभी कुछ ऐसा कहने का मन करता है, जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता।
कभी कभी यूं चुप रहने का मन करता है, जैसा खामोशी से नहीं रहा जा सकता।
चुपचाप कुछ कहकर अंदर उठते शोर को शांत करके देखो, बड़ा मजा आएगा।
बेमतलब बातों के जंगल में सन्नाटे के साथ सैर करके देखो, बड़ा मजा आएगा।
कुछ कहना, ना कहना
चुप रहना, ना रहना
कभी कभी सब बेमानी है
जिंदगी पांव में धूप लपेटे अंधेरे की कहानी है




पेंटिंग गूगल से साभार

Saturday, June 15, 2013

दीवार से लटकती बेल

कभी वो बेल देखी है जो जिसका तना मजबूत नहीं होता। वो जो ऊपर बढ़ती है तो अपने ही पत्तों के बोझ से झुक जाती है। फिर उसमें से तार जैसे महीन धागे से निकलने लगते हैं और वो जिससे भी टच होते हैं, उसे के चारों और घूम जाते हैं। फिर बेल उसके सहारे ऊपर उठती है। फिर अपने ही पत्तों के बोझ से झुकती है तो उसमें से निकला वो तार जैसा धागा फिर अपने आसपास किसी और चीज से लिपट जाता है। फिर देखते ही देखते वह बेल अपने आप ऊपर की और बढ़ती जाती है और एक दिन भरी पूरी हो जाती है। अपनी हरियाली से पूरी दीवार को ढंक लेती है और उसकी वजह से उसके आसपास का सब कुछ हरा भरा, सुंदर सुंदर सा लगने लगता है।

दीवार से लटकती ऐसी बेलें सबने देखी होगी। पर ऐसी ही कुछ बेलें हमारे बीच में भी पलती हैं, जो अक्सर हम देखते हैं पर उन पर गौर नहीं करते। मैंने ऐसी बेलें बहुत करीब से देखी हैं। मुझे उनका अपने आसपास किसी न किसी से लिपट कर ऊपर बढ़ते जाना बहुत सुहाता है। आज सुबह अखबार में पूजा प्रसाद का आर्टिकल पढ़ा। पूजा ने ऐसी ही तीन बेलों का जिक्र किया था। कुछ ही देर में लगा कि अखबार से कुछ तार जैसे धागे निकल कर मेरे चारों और लिपट रहे हैं। फिर जेहन में कई सारी बेलें आ गईं और उनके तार जैसे धागे भी। जैसे तैसे उन धागों से निकलकर ऑफिस के लिए चल दिया। रास्ते भर सोचता रहा, क्या कोई बेल ऐसे ऊपर बढऩे पर खुश होती होगी या उसे यह पछतावा होता होगा कि मेरा तना इतना मजबूत क्यों नहीं कि मैं बिना किसी से लिपटे ऊपर बढ़ सकूं।

पता है, कुछ बेलें ऐसी भी होती हैं जो अपने मजबूत तनों की कद्र नहीं करतीं। जब वे ऊपर बढ़ जाती हैं तो उन्हें लगता है उसके ऊपर बढऩे में उसके तने का कोई रोल नहीं। उसका तना बेकार है। उसे अपनी हरियाली दिखती है बस। ऐसी बेलें अगर मजबूत तना नहीं होने के कारण तार जैसे धागों के सहारे ऊपर बढ़ती बेलों को देखें तो उन्हें पता चले कि उनका तना ही है जिसकी वजह से वे आसानी से ऊपर बढ़ी हैं। मैं उस आर्टिकल को एज इट ईज ब्लॉग पर डाल रहा हूं।

भगवान करे बिना मजबूत तने की बेलें ऐसे ही ऊपर बढ़ती रहें।

और मजबूत तने वाली बेलें अपने तने का शुक्रिया अदा करना सीखें।



एक है विनय। बेहद कम हंसता है। हंसी आए भी तो माथे पर शिकन लाकर हंसी को दबा लेता है। हंसना बच्चा होने की निशानी है, ऐसा लगता है उसे।
एक है मृणाल। हर समय अपनी देहयष्टि और रूप-रंग को लेकर परेशान और सतर्क रहती है। कहती है, अपने लिए लड़का खुद ही ढूंढना है उसे। इसलिए, आम लड़कियों से 'ज्यादा एलीजिबल' होना चाहिए उसे।
एक है गौरव। उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है। वह किसी हमउम्र से नजदीकी बढ़ने पर खुद को जल्द ही उससे दूर कर लेता है। कहता है, उसके ऐज ग्रुप की लड़कियां मेंटली और इमोशनली बहुत ही 'बच्ची' होती हैं। उसे कोफ्त होती है।
तीनों की उम्र 19 से 23 के बीच है। तीनों पढ़ रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं। मिडल क्लास फैमिली से हैं। इन तीनों में एक और समानता है- पिता के हाथ का अहसास इनकी हथेलियों से काफी पहले गुम हो गया था। बचपन में ही तीनों अपने-अपने पिता खो चुके हैं। इत्तेफाक से, पिछले दो महीने में मैं इन तीनों के अलावा भी कुछ ऐसे लोगों के संपर्क में आई जिनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
बड़ा होना इतना भी बड़ा नहीं कि उम्र से पहले ही बड़ा हो लिया जाए। ऐसा सा ही कुछ मैं विनय को कहती। लेकिन कुछ अजीब सा छाती पर अटा सा पड़ा रहता है उसके। वह बोलने-चालने में निपुण है और उसके व्यवहार से उसके जहनोदिल पर बिछी उस मोटी परत का अंदाजा नहीं लगता जिसे वयस्कता कहते हैं। एक अजीब सा अपराध बोध उसे महसूस होता है यदि वह रिलैक्स रहता है। उसे लगता है कि उसे और जिम्मेदार होना चाहिए। वह परिवार से संबंधित कई जिम्मेदारियां उठाता है। घर बाहर के कई काम करता है। सोसायटी का लोकप्रिय 'बेटा' है। कई आंटियों की जब-तब मदद करता है। लेकिन, सबका राजा बेटा विनय खुद की एक्सपेक्टेशन्स पर खरा नहीं उतर पाता। सच तो यह है (जैसा कि उसने खुद कहा भी) कि वह अपने भीतर अपने पिता को देखना चाहता है। वह अपने व्यवहार में अपने पिता सा होना चाहता है। परिवार में खुद को पिता के रूप में देखने के लिए वह ऐसी असंभव जद्दोजहद कर रहा है जो उसे कतई नहीं करनी चाहिए। आखिर वह एक अलग शख्सियत है। लेकिन, जिंदगी 'चाहिए' पर नहीं चलती। उम्मीदें 'चाहिए' के आधार पर नहीं जन्म लेतीं।
मैं छोटी थी, तब अक्सर सुनती थी, फलां के पिता नहीं हैं न, इसलिए वह बड़ा ही बदमाश किस्म का है... पढ़ने-लिखने में फिसड्डी है... मां की सुनता नहीं है... उद्दंड है...। लेकिन, देख रही हूं कि पिता जब कोमल उंगलियों को परिपक्व होने से पहले ही झटक कर चले जाते हैं, तब वे कोमल उंगलियां वक्त से पहले ही प्रौढ़ हो जाती हैं। बीच के कुछ साल, जैसे, जिंदगी से गायब हो जाते हैं। इन गायब दिनों को भर पाना संभव है क्या? कैसे? कल के दिन मुझे विनय,मृणाल और गौरव बहुत याद आएंगे। कल फादर्स डे है न।... और मैं कल के दिन अपने पिता से लिपट कर बस रोना चाहती हूं।

Thursday, May 30, 2013

गौरेया मेरे पास आई थी


निधीश त्यागी जी की बात याद आ गई। एक दिन उन्होंने कहा था कि कविता गौरेया की तरह होती है, बुलाओ तो नहीं आती, अपने आप ही आती है। कुछ दिन पहले यह गौरेया मेरे पास आई थी। मैंने इसके पंख सहलाए थे और दोनों हाथों से उठाकर अपने कंधे पर बिठाया था। लेकिन फिर नींद आ गई और अगले दिन गौरेया का ख्याल भी उसकी तरह उड़ गया। इसके नन्हें पंजों के निशान वाला कागज मेरे पास रह गया था। जब जब इन निशानों को देखा, सोचा सबको दिखाता हूं कि गौरेया आई थी। पर फिर पता नहीं क्यों, कागज मोड़ के फिर जेब में रख लेता था। आज अचानक इस कागज ने पड़े पड़े फडफ़ड़ाना शुरू कर दिया। लगा कि वही गौरेया कहीं किसी जाल में उलझ गई है और पंख फडफ़ड़ा रही है। इसकी छटपटाहट को दूर ना किया तो बेचारी कहीं मर ना जाए। मैंने कागज निकाला और उन पंजों के निशान समेत हवा में उड़ा दिया। यह निशान अब मेरे ब्लॉग पर छप गए हैं। मैं जब चाहे इसे देख सकूंगा। आप भी देख सकते हैं। पता नहीं आपको गौरेया दिखाई दे या नहीं, पर मुझे दिख रही है। जब तक यह फिर नहीं आती, मैं इन्हीं निशानों से काम चलाऊंगा।

कितना बोर हो गया है ये टेलिविजन
300 चैनल हैं पर एक पर भी ढंग का प्रोग्राम नहीं आता
इंटरनेट भी तो कम बोरिंग नहीं
पचास साइट खोल ली एक पर भी टिकने का मन नहीं
कूलर का पंप चलाओ तो ठंडा ज्यादा
न चलाओ तो कमबख्त कितनी गर्म हवा देता है
सोफे पर सोऊं या बेड पर जाऊं
गली के बच्चे कितने नीरस हैं, कोई शोर ही नहीं
मां पूछती है क्या सब्जी बनाऊं, क्या बताऊं
खाने का मन नहीं, भूख तो लगी है लेकिन
चलो टहल के आता हूं,
रहने दे यार, धूल धक्कड़ में कैसा टहलना
फेसबुक पर क्या खाक चेक करूं,
कोई ढंग की पोस्ट ही नहीं करता, हां मैं भी नहीं
और ये गानों को क्या हुआ, सारे फेवरिट कानों को खा रहे हैं
वक्त पैर पर पत्थर बांधे औंधे मुंह पड़ा ऊंघ रहा है
जी करता है इसका इल्जाम अपने सिर पे ले लूं
खुद उसकी जगह बेहोश हो जाऊं
और उसे होश में लाकर उड़ा दूं आसमान में।

Wednesday, April 24, 2013

ओपड़ी गुडग़ुड़ दी

हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के बारे में जब कभी कोई जिक्र आता है तो मन में अजीब सा मिश्रित सा भाव तैर जाता है। मेरा ख्याल है कि हमारे देश के (शायद पाकिस्तान के भी) युवा अक्सर इस मिश्रित भाव से रूबरू होते होंगे। (मैं तो ऐसा ही सोचता हूं, हो सकता है ये मेरी गलतफहमी हो)। अब तक कहानियों किताबों में ही उन हालात के बारे में सुना है, जब अपनी जीवन भर की पूंजी, जन्मभूमि और अपनी जगह से मिला अपनापन छोड़कर एक पार के लोग दूसरी पार गए थे। अब तक अमृता प्रीतम और कुछ और की रचनाओं से वह तकलीफ महसूस करने की कोशिश की थी, लेकिन आज सआदत हसन मंटो की कहानी, 'टोबा टेक सिंह' पढऩे का टाइम मिला। बहुत सुना था इसके बारे में। इसे पढ़कर कैसा लगा, यह मैं यहां लिखूंगा नहीं। सोचता हूं इस कहानी को पढ़वाकर आपको महसूस ही करवा दूं, तब शायद इसे ज्यादा ठीक अभिव्यक्ति मिले। और हां...एक रिक्वेस्ट : 20-25 मिनट की फुर्सत और पेशंश हो तो ही पढऩा शुरू करें, वरना फिर कभी सही।
पढऩे लिखने की जिन्हें ज्यादा आदत या शौक नहीं, वे शायद मंटो के बारे में ज्यादा नहीं जानते होंगे, इसलिए थोड़ा सा बता दूं कि यह बहुत बड़े कहानीकार, फिल्म लेखक हुए हैं। इनकी कहानियों को पाकिस्तान में बैन भी किया गया। मुकदमा तक चला। बताते हैं कि इससे मंटो इतने आहत थे कि उनका दिमागी संतुलन तक बिगड़ गया था। भारत पाकिस्तान के बंटवारे को मंटो ने बहुत नजदीक से देखा था। बॉलिवुड में कई फिल्में लिखने के बाद उन्होंने पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया था। 1955 में उनकी मौत हो गई थी। उनकी कहानियां बवाल मचा दिया करती थीं। वाकई उनकी कलम में आग थी। यह कहानी मैंने http://gadyakosh.org/gk पर पढ़ी। रमेश तिवारी जी ने कल मुझे इस साइट के बारे में बताया था। साइट गजब की है और पढऩे के शौकीनों को यह कहने में ताज्जुब नहीं लगेगा। यह साइट से साभार ले रहा हूं। बस, कुछ बेहद मुश्किल उर्दू शब्दों को आसान हिंदी शब्दों में बदला है, वह भी बस इस मंशा से कि पढऩे में आसानी रहे। बाकी वर्ड टु वर्ड वही है।



टोबा टेक सिंह
बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि बाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाए।
मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, सरकारों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कॉन्फ्रेंसें हुई और दिन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छानबीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके सगे सम्बन्धी हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये।
उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चर्चाएं होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी से जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा-
– मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?
तो उसने बड़े गौरो-फिक्र के बाद जवाब दिया-
– हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।
ये जवाब सुनकर उसका दोस्त चुप हो गया।
इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा
– सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है - हमें तो वहां की बोली नहीं आती।
दूसरा मुस्कराया-
– मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है - हिन्दुस्तानी बड़े शैतानी आकड़-आकड़ फिरते हैं।
एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया।
बाज पागल ऐसे थे जो पागल नहीं थे। उनमें प्रवृति ऐसे कातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे-दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान को क्या नसीब हुआ और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन असलियत से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उनकी गुफ्तगू (बातचीत) से भी वो कोई नतीजा हासिल नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे आज़म कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है? इसका स्थल क्या है, इसके बारे में वह कुछ नहीं जानते थे। यही वजह है कि पागलखाने में वो सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह खराब नहीं हुआ था, इस असमंजस में थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है। अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ्तार हुआ कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे दलीलें देता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मसले पर था। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया, धमकाया गया तो उसने कहा-
– मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में। मैं इस दरख्त पर ही रहूंगा।
एक एम.एससी. पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास क्यारी पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर जेलकर्मी के हवाले कर दिये और नंगधंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।
यन्यूट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक कार्यकर्ता था और दिन में पन्द्रह-सोलह बार नहाता था, एकदम यह आदत छोड़ दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। और तो और, उसने एक दिन अपने जंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखादेखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जंगले में खून-खराबा हो जाय, मगर दोनों को खतरनाक पागल करार देकर अलग-अलग बंद कर दिया गया।
लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था जो मुहब्बत में फेल होकर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। इसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे मुहब्बत हो गयी थी। गो उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको नहीं भूला था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये। उसकी महबूबा हिन्दुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे, उसको हिन्दुस्तान वापस भेज दिया जायेगा। उस हिन्दुस्तान में जहां उसकी महबूबा रहती है। मगर वह लाहौर छोडऩा नहीं चाहता था। इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।
यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बहुत रंज हुआ। वह छुप-छुप कर इस मसअले पर गुफ्तगू करते रहते कि पागलखने में उनकी हैसियत क्या होगी। यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ जाएगा। ब्रेकफास्ट मिलेगा या नहीं। क्या उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो नहीं खानी पड़ेगी?
एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज सुनने में आते थे, 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।' वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह बरस के लंबे अर्से में एक एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। अलबत्ता किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।
हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के बारे में जब कभी पागलखाने में गुफ्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी संजीदगी से जवाब देता, 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।'
लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो यह बताने की कोशिश करते थे वो खुद इस उलझाव में गिरफ्तार हो जाते थे कि स्याल कोटा पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है कल हिन्दुस्तान में चला जाएगा या सारा हिन्दुस्तान हीं पाकिस्तान बन जायेगा। और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब नहीं हो जायेंगे।
उस सिख पागल के केस छिदरे होके बहुत कम रह गए थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे जिनके कारण उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। मगर आदमी किसी को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं था। पन्द्रह बरसों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने मुलाजिम थे वो उसके बारे में इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।
महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी खैर-खैरियत पता करके चले जाते थे। एक अरसे तक ये सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।
उसका नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने दिन बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके अजीज व सम्बन्धी उससे मिलने के लिए आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। मानो वो जेलकर्मी से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवा के पहनता और यूं सज-बन कर मिलने वालों के पास आता। वो उससे कुछ पूछते तो वह खामोश रहता या कभी-कभार 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी वेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी लालटेन' कह देता। उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी आपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब सन्तोषजनक जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब- दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनकी आमद की खबर दे दिया करती थी।
उसकी बड़ी ख्वाहिश थी कि वो लोग आयें जो उससे हमदर्दी का इजहार करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वो उनसे अगर पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो यकीनन वो उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका ख्याल था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं जहां उसकी जमीनें हैं।
पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में तो उसने आदत के अनुसार कहकहा लगाया और कहा
– वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं लगाया।
बिशन सिंह ने इस खुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत बिजी था, इसलिए कि उसे ओर बेशुमार हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ वाहे गुरूजी दा खलसा एन्ड वाहे गुरूजी की फतह। जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल।' उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमान के खुदा हो, सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते। तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान दोस्त मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हट गया और वापस आने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका - ये तुमसे मिलने आया है - तुम्हारा दोस्त फजलदीन है।
बिशन सिंह ने फजलदीन को देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।
– मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी खैरियत से चले गये थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैंने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर...। वह कुछ कहते कहते रूक गया। बिशन सिंह कुछ याद करने लगा
– बेटी रूप कौर ।
फजलदीन ने रूक कर कहा-
– हां वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।
बिशन सिंह खामोश रहा। फजलदीन ने कहना शुरू किया-
– उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी खैर-खैरियत पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से सलाम कहना - और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना फजलदीन राजी-खुशी है। वो भूरी भैंसें जो वो छोड़ गये थे उनमें से एक ने कट्टा दिया है, दूसरी के कट्टी हुई थी पर वो छ: दिन की हो के मर गयी और और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना, मैं। हर वक्त तैयार हूं और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरून्डे (गजक जैसे) लाया हूं।
बिशन सिंह ने मरून्डे की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलदीन से पूछा- टोबा टेकसिंह कहां है?
– टोबा टेकसिंह... उसने कद्रे हैरत से कहा - कहां है! वहीं है, जहां था।
बिशन सिंह ने पूछा - पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में?
– हिन्दुस्तान में...। नहीं-नहीं पाकिस्तान में...।
फजलदीन बौखला-सा गया। बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया - 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हए फिटे मुंह।'
तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की सूचियां पहुंच गयी थीं, तबादले का दिन भी तय हो गया था। सख्त सर्दियां थीं। जब लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के दस्ते के साथ् रवाना हुई तो संबंधित अफसर भी साथ थे। वाहगा के बार्डर पर दोनों तरफ से सुपरिटेंडेंट एक दूसरे से मिले और कागजी कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रजामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते। क़ोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी। पागल औरतों का शेरोगोगा अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत बज रहे थे।
पागलों की प्रवृति इस तबादले के हक में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। चंद जो कुछ सोच रहे थे, 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन बार फसाद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमान और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया।
जब बिशन सिंह की बारी आयी और वाहगा के उस पार संबंधित अफसर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा - टोबा टेकसिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में? -अफसर हंसा - पाकिस्तान में।
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी मांदा साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा - टोबा टेकसिंह कहां है- ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एन्ड पाकिस्तान।'
उसे बहुत समझाया गया कि देखो अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जाएगा। मगर वो न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गयी तो वह बीच में एक जगह इस अन्दाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी।
आदमी चूंकि किसी को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं था इसलिए उससे जबरदस्ती न की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले शान्त बिशन सिंह के हलक से आसमान को फाड़ देने वाली चीख निकली - इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये और देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर खारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था - इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। बीच में जमीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।



फोटो - साभार गूगल

Wednesday, February 13, 2013

हंसते हुए लड़के की तस्वीर


कहते हैं स्मृतियों की उम्र होती है। वक्त के साथ-साथ पहले वे धुंधली पड़ती हैं, फिर और धुंधली और फिर मिट सी जाती हैं। मिट सी इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाबा सिग्मंड फ्रायड कहते थे कि वे हमारे अनकॉन्शस माइंड में हमेशा के लिए कैद होती हैं। हमारे मर जाने के बाद भी। कई बार सपनों में आ जाती हैं। अगले पिछले जन्म की उनकी थ्योरी को बेतुका या बकवास कहने का अभी मेरा मन नहीं हैं, आपको कहना हो तो कह लीजिए। मेरा मन तो धुंधली हो रही स्मृतियों को शब्दों के रंग देकर थोड़ा चटक करने का है। हो सकता है ऐसा करने से धुंधली होने का उनका प्रोसेस शायद थोड़ा धीमा हो जाए और इन शब्दों के रंगों को देख-देख लगने लगे कि यह तस्वीर पुरानी नहीं पड़ेगी। पता नहीं सच में पुरानी नहीं पड़ेगी या मेरी खुशफहमी है, पर करके देखने में क्या जाता है। यह कविता स्मृतियों के साथ इसी खिलवाड़ का नतीजा है जो कल ही इस शक्ल में सामने आई है। कविताएं तो और भी लिखी हैं पर इससे अलग तरह का अपनापन महसूस हुआ है। आपसे शेयर कर रहा हूं... इसी बहाने अपनी स्मृतियों को टटोलना चाहें तो टटोल लीजिए :

सपने में एक रास्ता जाना पहचाना नजर आया
टेढ़ी मेढ़ी गलियों के बीचों बीच बेतरतीब बहती काली गंदी नालियां
कई साल से गड़े खूंटों पर बंधी गोबर से सनी भैंसें और उनकी कटिया
आवारा बीमार आलसी कुत्तों की पूंछ खींचते नंगे पुंगे बच्चों का शोर
कपड़े धोने वाली थापी और प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलते किशोर
उधड़ी हुई ईंटों वाली गलियों में सब्जी बेचते चेहरे में छिपी उदासियां
घरों के बाहर सीढ़ी पर बैठी बूढ़ी चाचियां, ताइयां और मासियां
और फिर नजर आया
चर्र की आवाज से खुलने वाला घिसी हुई चौखट से लटका हुआ किवाड़
टूटी हुई अंगीठी पर कालिख से मोटा हो चुका पानी गर्म करने का भगोना
पुराने कपड़ों को गूंथ कर बनी रस्सी पर सूखता गीला तौलिया और बनियान
दीवार पर ढिठाई से गढ़ी कील पर लटकती कचरी की सूखी माला
टूटे हुए शीशे के टुकड़े, खाली कांच की बोतलें और एक टूटा हुआ मग
सब के सब कुछ जाने पहचाने से
जाना पहचाना सा ही था कड़ी वाली छत पर टूटी खिड़की वाला चौबारा
और चौबारे में रखी पुरानी सीनरियां, कांसे की टोकनी और टूटा टेबल लैंप
वहीं रखे हुए थे हाथ से लिखे नोट्स के जिरोक्स, फटे हुए रजिस्टर और उदास किताबें
रसोई में रखी रहने वाली जाली जिसमें मां नमक मिर्च की शीशियां रखती थीं
और इससे पहले कि कुछ और नजर आता नजर आ गई एक तस्वीर
मकड़ी के जालों में छिपी कन्वोकेशन गाउन वाले हंसते हुए लड़के की तस्वीर
आखिरी दिन कॉलेज ग्राउंड की रेत पर बड़े चाव से खिंचवाई थी
पर अब अकेली है बाकी धूल में सनी पुरानी ग्रुप फोटुओं के साथ
हंसता हुआ चेहरा भर था इसमें, पर हंसती नजर नहीं आ रही थी
पता नहीं क्यों
घर पर घर बदल जाते हैं दौड़ती भागती जिंदगी में
पर घर नहीं बदलता,
और
ना ही बदलती हैं उसे छोड़ जाने की मजबूरियां।

Friday, February 8, 2013

मेरा सफर


मेरे कुछ और शे'र। अक्टूबर और नवंबर 11 के दरम्यान अक्सर घर जाते वक्त कैब में लिखे। अलग-अलग दिन अलग-अलग मिजाज की अपनी उस तस्वीर को आज भी इन शे'रों में साफ देख लेता हूं। हालांकि बदलते वक्त में अपनी ही तस्वीर अक्सर पराई लगने लगती है। फिर भी.... खैर... कुछ शेर आपसे शेयर करता हूं...


तेरे सफर से जुदा है सफर मेरा
तुझे थकने का इंतजार, मुझे चलने की जुस्तजू।

23 अक्टूबर-11

मंजिलें चूमेंगी कदम, रास्ते मुसकाएंगे
राहों को तन्हा न रखना, फासले मिट जाएंगे।

23 अक्टूबर-11

मुस्कुराहटों का दामन थामे रखना
राह में दुश्वारियां हैं बहुत

29 अक्टूबर-11

तेरी छुअन से महके थे जो फूल, सूख भी गए तो क्या
मेरे ख्यालों से तेरी खुश्बू कभी मिट ना पाएगी।

30 अक्टूबर-11

जिंदगी की फिक्रें बड़ी बेरहम होती हैं,
बचपन को मसल देती हैं किसी फूल की तरह।

2 नवंबर-11

उनकी इस अदा का कोई इल्म नहीं था
देखा इक नजर और सब लूट ले गए

2 नवंबर-11

बदलना मौसम का मिजाज है, हवाओं की शरारत नहीं
ये तो खुशबुओं की सौदागर हैं, कभी इधर की कभी उधर की

3 नवंबर-11