Saturday, June 15, 2013

दीवार से लटकती बेल

कभी वो बेल देखी है जो जिसका तना मजबूत नहीं होता। वो जो ऊपर बढ़ती है तो अपने ही पत्तों के बोझ से झुक जाती है। फिर उसमें से तार जैसे महीन धागे से निकलने लगते हैं और वो जिससे भी टच होते हैं, उसे के चारों और घूम जाते हैं। फिर बेल उसके सहारे ऊपर उठती है। फिर अपने ही पत्तों के बोझ से झुकती है तो उसमें से निकला वो तार जैसा धागा फिर अपने आसपास किसी और चीज से लिपट जाता है। फिर देखते ही देखते वह बेल अपने आप ऊपर की और बढ़ती जाती है और एक दिन भरी पूरी हो जाती है। अपनी हरियाली से पूरी दीवार को ढंक लेती है और उसकी वजह से उसके आसपास का सब कुछ हरा भरा, सुंदर सुंदर सा लगने लगता है।

दीवार से लटकती ऐसी बेलें सबने देखी होगी। पर ऐसी ही कुछ बेलें हमारे बीच में भी पलती हैं, जो अक्सर हम देखते हैं पर उन पर गौर नहीं करते। मैंने ऐसी बेलें बहुत करीब से देखी हैं। मुझे उनका अपने आसपास किसी न किसी से लिपट कर ऊपर बढ़ते जाना बहुत सुहाता है। आज सुबह अखबार में पूजा प्रसाद का आर्टिकल पढ़ा। पूजा ने ऐसी ही तीन बेलों का जिक्र किया था। कुछ ही देर में लगा कि अखबार से कुछ तार जैसे धागे निकल कर मेरे चारों और लिपट रहे हैं। फिर जेहन में कई सारी बेलें आ गईं और उनके तार जैसे धागे भी। जैसे तैसे उन धागों से निकलकर ऑफिस के लिए चल दिया। रास्ते भर सोचता रहा, क्या कोई बेल ऐसे ऊपर बढऩे पर खुश होती होगी या उसे यह पछतावा होता होगा कि मेरा तना इतना मजबूत क्यों नहीं कि मैं बिना किसी से लिपटे ऊपर बढ़ सकूं।

पता है, कुछ बेलें ऐसी भी होती हैं जो अपने मजबूत तनों की कद्र नहीं करतीं। जब वे ऊपर बढ़ जाती हैं तो उन्हें लगता है उसके ऊपर बढऩे में उसके तने का कोई रोल नहीं। उसका तना बेकार है। उसे अपनी हरियाली दिखती है बस। ऐसी बेलें अगर मजबूत तना नहीं होने के कारण तार जैसे धागों के सहारे ऊपर बढ़ती बेलों को देखें तो उन्हें पता चले कि उनका तना ही है जिसकी वजह से वे आसानी से ऊपर बढ़ी हैं। मैं उस आर्टिकल को एज इट ईज ब्लॉग पर डाल रहा हूं।

भगवान करे बिना मजबूत तने की बेलें ऐसे ही ऊपर बढ़ती रहें।

और मजबूत तने वाली बेलें अपने तने का शुक्रिया अदा करना सीखें।



एक है विनय। बेहद कम हंसता है। हंसी आए भी तो माथे पर शिकन लाकर हंसी को दबा लेता है। हंसना बच्चा होने की निशानी है, ऐसा लगता है उसे।
एक है मृणाल। हर समय अपनी देहयष्टि और रूप-रंग को लेकर परेशान और सतर्क रहती है। कहती है, अपने लिए लड़का खुद ही ढूंढना है उसे। इसलिए, आम लड़कियों से 'ज्यादा एलीजिबल' होना चाहिए उसे।
एक है गौरव। उसकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है। वह किसी हमउम्र से नजदीकी बढ़ने पर खुद को जल्द ही उससे दूर कर लेता है। कहता है, उसके ऐज ग्रुप की लड़कियां मेंटली और इमोशनली बहुत ही 'बच्ची' होती हैं। उसे कोफ्त होती है।
तीनों की उम्र 19 से 23 के बीच है। तीनों पढ़ रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं। मिडल क्लास फैमिली से हैं। इन तीनों में एक और समानता है- पिता के हाथ का अहसास इनकी हथेलियों से काफी पहले गुम हो गया था। बचपन में ही तीनों अपने-अपने पिता खो चुके हैं। इत्तेफाक से, पिछले दो महीने में मैं इन तीनों के अलावा भी कुछ ऐसे लोगों के संपर्क में आई जिनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
बड़ा होना इतना भी बड़ा नहीं कि उम्र से पहले ही बड़ा हो लिया जाए। ऐसा सा ही कुछ मैं विनय को कहती। लेकिन कुछ अजीब सा छाती पर अटा सा पड़ा रहता है उसके। वह बोलने-चालने में निपुण है और उसके व्यवहार से उसके जहनोदिल पर बिछी उस मोटी परत का अंदाजा नहीं लगता जिसे वयस्कता कहते हैं। एक अजीब सा अपराध बोध उसे महसूस होता है यदि वह रिलैक्स रहता है। उसे लगता है कि उसे और जिम्मेदार होना चाहिए। वह परिवार से संबंधित कई जिम्मेदारियां उठाता है। घर बाहर के कई काम करता है। सोसायटी का लोकप्रिय 'बेटा' है। कई आंटियों की जब-तब मदद करता है। लेकिन, सबका राजा बेटा विनय खुद की एक्सपेक्टेशन्स पर खरा नहीं उतर पाता। सच तो यह है (जैसा कि उसने खुद कहा भी) कि वह अपने भीतर अपने पिता को देखना चाहता है। वह अपने व्यवहार में अपने पिता सा होना चाहता है। परिवार में खुद को पिता के रूप में देखने के लिए वह ऐसी असंभव जद्दोजहद कर रहा है जो उसे कतई नहीं करनी चाहिए। आखिर वह एक अलग शख्सियत है। लेकिन, जिंदगी 'चाहिए' पर नहीं चलती। उम्मीदें 'चाहिए' के आधार पर नहीं जन्म लेतीं।
मैं छोटी थी, तब अक्सर सुनती थी, फलां के पिता नहीं हैं न, इसलिए वह बड़ा ही बदमाश किस्म का है... पढ़ने-लिखने में फिसड्डी है... मां की सुनता नहीं है... उद्दंड है...। लेकिन, देख रही हूं कि पिता जब कोमल उंगलियों को परिपक्व होने से पहले ही झटक कर चले जाते हैं, तब वे कोमल उंगलियां वक्त से पहले ही प्रौढ़ हो जाती हैं। बीच के कुछ साल, जैसे, जिंदगी से गायब हो जाते हैं। इन गायब दिनों को भर पाना संभव है क्या? कैसे? कल के दिन मुझे विनय,मृणाल और गौरव बहुत याद आएंगे। कल फादर्स डे है न।... और मैं कल के दिन अपने पिता से लिपट कर बस रोना चाहती हूं।

Thursday, May 30, 2013

गौरेया मेरे पास आई थी


निधीश त्यागी जी की बात याद आ गई। एक दिन उन्होंने कहा था कि कविता गौरेया की तरह होती है, बुलाओ तो नहीं आती, अपने आप ही आती है। कुछ दिन पहले यह गौरेया मेरे पास आई थी। मैंने इसके पंख सहलाए थे और दोनों हाथों से उठाकर अपने कंधे पर बिठाया था। लेकिन फिर नींद आ गई और अगले दिन गौरेया का ख्याल भी उसकी तरह उड़ गया। इसके नन्हें पंजों के निशान वाला कागज मेरे पास रह गया था। जब जब इन निशानों को देखा, सोचा सबको दिखाता हूं कि गौरेया आई थी। पर फिर पता नहीं क्यों, कागज मोड़ के फिर जेब में रख लेता था। आज अचानक इस कागज ने पड़े पड़े फडफ़ड़ाना शुरू कर दिया। लगा कि वही गौरेया कहीं किसी जाल में उलझ गई है और पंख फडफ़ड़ा रही है। इसकी छटपटाहट को दूर ना किया तो बेचारी कहीं मर ना जाए। मैंने कागज निकाला और उन पंजों के निशान समेत हवा में उड़ा दिया। यह निशान अब मेरे ब्लॉग पर छप गए हैं। मैं जब चाहे इसे देख सकूंगा। आप भी देख सकते हैं। पता नहीं आपको गौरेया दिखाई दे या नहीं, पर मुझे दिख रही है। जब तक यह फिर नहीं आती, मैं इन्हीं निशानों से काम चलाऊंगा।

कितना बोर हो गया है ये टेलिविजन
300 चैनल हैं पर एक पर भी ढंग का प्रोग्राम नहीं आता
इंटरनेट भी तो कम बोरिंग नहीं
पचास साइट खोल ली एक पर भी टिकने का मन नहीं
कूलर का पंप चलाओ तो ठंडा ज्यादा
न चलाओ तो कमबख्त कितनी गर्म हवा देता है
सोफे पर सोऊं या बेड पर जाऊं
गली के बच्चे कितने नीरस हैं, कोई शोर ही नहीं
मां पूछती है क्या सब्जी बनाऊं, क्या बताऊं
खाने का मन नहीं, भूख तो लगी है लेकिन
चलो टहल के आता हूं,
रहने दे यार, धूल धक्कड़ में कैसा टहलना
फेसबुक पर क्या खाक चेक करूं,
कोई ढंग की पोस्ट ही नहीं करता, हां मैं भी नहीं
और ये गानों को क्या हुआ, सारे फेवरिट कानों को खा रहे हैं
वक्त पैर पर पत्थर बांधे औंधे मुंह पड़ा ऊंघ रहा है
जी करता है इसका इल्जाम अपने सिर पे ले लूं
खुद उसकी जगह बेहोश हो जाऊं
और उसे होश में लाकर उड़ा दूं आसमान में।

Wednesday, April 24, 2013

ओपड़ी गुडग़ुड़ दी

हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के बारे में जब कभी कोई जिक्र आता है तो मन में अजीब सा मिश्रित सा भाव तैर जाता है। मेरा ख्याल है कि हमारे देश के (शायद पाकिस्तान के भी) युवा अक्सर इस मिश्रित भाव से रूबरू होते होंगे। (मैं तो ऐसा ही सोचता हूं, हो सकता है ये मेरी गलतफहमी हो)। अब तक कहानियों किताबों में ही उन हालात के बारे में सुना है, जब अपनी जीवन भर की पूंजी, जन्मभूमि और अपनी जगह से मिला अपनापन छोड़कर एक पार के लोग दूसरी पार गए थे। अब तक अमृता प्रीतम और कुछ और की रचनाओं से वह तकलीफ महसूस करने की कोशिश की थी, लेकिन आज सआदत हसन मंटो की कहानी, 'टोबा टेक सिंह' पढऩे का टाइम मिला। बहुत सुना था इसके बारे में। इसे पढ़कर कैसा लगा, यह मैं यहां लिखूंगा नहीं। सोचता हूं इस कहानी को पढ़वाकर आपको महसूस ही करवा दूं, तब शायद इसे ज्यादा ठीक अभिव्यक्ति मिले। और हां...एक रिक्वेस्ट : 20-25 मिनट की फुर्सत और पेशंश हो तो ही पढऩा शुरू करें, वरना फिर कभी सही।
पढऩे लिखने की जिन्हें ज्यादा आदत या शौक नहीं, वे शायद मंटो के बारे में ज्यादा नहीं जानते होंगे, इसलिए थोड़ा सा बता दूं कि यह बहुत बड़े कहानीकार, फिल्म लेखक हुए हैं। इनकी कहानियों को पाकिस्तान में बैन भी किया गया। मुकदमा तक चला। बताते हैं कि इससे मंटो इतने आहत थे कि उनका दिमागी संतुलन तक बिगड़ गया था। भारत पाकिस्तान के बंटवारे को मंटो ने बहुत नजदीक से देखा था। बॉलिवुड में कई फिल्में लिखने के बाद उन्होंने पाकिस्तान जाने का फैसला कर लिया था। 1955 में उनकी मौत हो गई थी। उनकी कहानियां बवाल मचा दिया करती थीं। वाकई उनकी कलम में आग थी। यह कहानी मैंने http://gadyakosh.org/gk पर पढ़ी। रमेश तिवारी जी ने कल मुझे इस साइट के बारे में बताया था। साइट गजब की है और पढऩे के शौकीनों को यह कहने में ताज्जुब नहीं लगेगा। यह साइट से साभार ले रहा हूं। बस, कुछ बेहद मुश्किल उर्दू शब्दों को आसान हिंदी शब्दों में बदला है, वह भी बस इस मंशा से कि पढऩे में आसानी रहे। बाकी वर्ड टु वर्ड वही है।



टोबा टेक सिंह
बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि बाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाए।
मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, सरकारों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कॉन्फ्रेंसें हुई और दिन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छानबीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके सगे सम्बन्धी हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये।
उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चर्चाएं होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी से जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा-
– मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?
तो उसने बड़े गौरो-फिक्र के बाद जवाब दिया-
– हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।
ये जवाब सुनकर उसका दोस्त चुप हो गया।
इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा
– सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है - हमें तो वहां की बोली नहीं आती।
दूसरा मुस्कराया-
– मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है - हिन्दुस्तानी बड़े शैतानी आकड़-आकड़ फिरते हैं।
एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया।
बाज पागल ऐसे थे जो पागल नहीं थे। उनमें प्रवृति ऐसे कातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे-दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान को क्या नसीब हुआ और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन असलियत से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उनकी गुफ्तगू (बातचीत) से भी वो कोई नतीजा हासिल नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे आज़म कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है? इसका स्थल क्या है, इसके बारे में वह कुछ नहीं जानते थे। यही वजह है कि पागलखाने में वो सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह खराब नहीं हुआ था, इस असमंजस में थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है। अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ्तार हुआ कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे दलीलें देता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मसले पर था। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया, धमकाया गया तो उसने कहा-
– मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में। मैं इस दरख्त पर ही रहूंगा।
एक एम.एससी. पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास क्यारी पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर जेलकर्मी के हवाले कर दिये और नंगधंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।
यन्यूट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक कार्यकर्ता था और दिन में पन्द्रह-सोलह बार नहाता था, एकदम यह आदत छोड़ दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। और तो और, उसने एक दिन अपने जंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखादेखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जंगले में खून-खराबा हो जाय, मगर दोनों को खतरनाक पागल करार देकर अलग-अलग बंद कर दिया गया।
लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था जो मुहब्बत में फेल होकर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। इसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे मुहब्बत हो गयी थी। गो उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको नहीं भूला था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये। उसकी महबूबा हिन्दुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे, उसको हिन्दुस्तान वापस भेज दिया जायेगा। उस हिन्दुस्तान में जहां उसकी महबूबा रहती है। मगर वह लाहौर छोडऩा नहीं चाहता था। इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।
यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बहुत रंज हुआ। वह छुप-छुप कर इस मसअले पर गुफ्तगू करते रहते कि पागलखने में उनकी हैसियत क्या होगी। यूरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ जाएगा। ब्रेकफास्ट मिलेगा या नहीं। क्या उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो नहीं खानी पड़ेगी?
एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज सुनने में आते थे, 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।' वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह बरस के लंबे अर्से में एक एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। अलबत्ता किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।
हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के बारे में जब कभी पागलखाने में गुफ्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी संजीदगी से जवाब देता, 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।'
लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो यह बताने की कोशिश करते थे वो खुद इस उलझाव में गिरफ्तार हो जाते थे कि स्याल कोटा पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है कल हिन्दुस्तान में चला जाएगा या सारा हिन्दुस्तान हीं पाकिस्तान बन जायेगा। और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब नहीं हो जायेंगे।
उस सिख पागल के केस छिदरे होके बहुत कम रह गए थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे जिनके कारण उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। मगर आदमी किसी को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं था। पन्द्रह बरसों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने मुलाजिम थे वो उसके बारे में इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।
महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी खैर-खैरियत पता करके चले जाते थे। एक अरसे तक ये सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।
उसका नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने दिन बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके अजीज व सम्बन्धी उससे मिलने के लिए आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। मानो वो जेलकर्मी से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवा के पहनता और यूं सज-बन कर मिलने वालों के पास आता। वो उससे कुछ पूछते तो वह खामोश रहता या कभी-कभार 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी वेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी लालटेन' कह देता। उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी आपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब सन्तोषजनक जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब- दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनकी आमद की खबर दे दिया करती थी।
उसकी बड़ी ख्वाहिश थी कि वो लोग आयें जो उससे हमदर्दी का इजहार करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वो उनसे अगर पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो यकीनन वो उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका ख्याल था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं जहां उसकी जमीनें हैं।
पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में तो उसने आदत के अनुसार कहकहा लगाया और कहा
– वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं लगाया।
बिशन सिंह ने इस खुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत बिजी था, इसलिए कि उसे ओर बेशुमार हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ वाहे गुरूजी दा खलसा एन्ड वाहे गुरूजी की फतह। जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल।' उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमान के खुदा हो, सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते। तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान दोस्त मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हट गया और वापस आने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका - ये तुमसे मिलने आया है - तुम्हारा दोस्त फजलदीन है।
बिशन सिंह ने फजलदीन को देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।
– मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी खैरियत से चले गये थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैंने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर...। वह कुछ कहते कहते रूक गया। बिशन सिंह कुछ याद करने लगा
– बेटी रूप कौर ।
फजलदीन ने रूक कर कहा-
– हां वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।
बिशन सिंह खामोश रहा। फजलदीन ने कहना शुरू किया-
– उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी खैर-खैरियत पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से सलाम कहना - और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना फजलदीन राजी-खुशी है। वो भूरी भैंसें जो वो छोड़ गये थे उनमें से एक ने कट्टा दिया है, दूसरी के कट्टी हुई थी पर वो छ: दिन की हो के मर गयी और और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना, मैं। हर वक्त तैयार हूं और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरून्डे (गजक जैसे) लाया हूं।
बिशन सिंह ने मरून्डे की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलदीन से पूछा- टोबा टेकसिंह कहां है?
– टोबा टेकसिंह... उसने कद्रे हैरत से कहा - कहां है! वहीं है, जहां था।
बिशन सिंह ने पूछा - पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में?
– हिन्दुस्तान में...। नहीं-नहीं पाकिस्तान में...।
फजलदीन बौखला-सा गया। बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया - 'ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हए फिटे मुंह।'
तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की सूचियां पहुंच गयी थीं, तबादले का दिन भी तय हो गया था। सख्त सर्दियां थीं। जब लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के दस्ते के साथ् रवाना हुई तो संबंधित अफसर भी साथ थे। वाहगा के बार्डर पर दोनों तरफ से सुपरिटेंडेंट एक दूसरे से मिले और कागजी कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रजामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते। क़ोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी। पागल औरतों का शेरोगोगा अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत बज रहे थे।
पागलों की प्रवृति इस तबादले के हक में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। चंद जो कुछ सोच रहे थे, 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन बार फसाद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमान और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया।
जब बिशन सिंह की बारी आयी और वाहगा के उस पार संबंधित अफसर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा - टोबा टेकसिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में? -अफसर हंसा - पाकिस्तान में।
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी मांदा साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा - टोबा टेकसिंह कहां है- ओपड़ी गुडग़ुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एन्ड पाकिस्तान।'
उसे बहुत समझाया गया कि देखो अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जाएगा। मगर वो न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गयी तो वह बीच में एक जगह इस अन्दाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी।
आदमी चूंकि किसी को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं था इसलिए उससे जबरदस्ती न की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले शान्त बिशन सिंह के हलक से आसमान को फाड़ देने वाली चीख निकली - इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये और देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर खारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था - इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। बीच में जमीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।



फोटो - साभार गूगल

Wednesday, February 13, 2013

हंसते हुए लड़के की तस्वीर


कहते हैं स्मृतियों की उम्र होती है। वक्त के साथ-साथ पहले वे धुंधली पड़ती हैं, फिर और धुंधली और फिर मिट सी जाती हैं। मिट सी इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाबा सिग्मंड फ्रायड कहते थे कि वे हमारे अनकॉन्शस माइंड में हमेशा के लिए कैद होती हैं। हमारे मर जाने के बाद भी। कई बार सपनों में आ जाती हैं। अगले पिछले जन्म की उनकी थ्योरी को बेतुका या बकवास कहने का अभी मेरा मन नहीं हैं, आपको कहना हो तो कह लीजिए। मेरा मन तो धुंधली हो रही स्मृतियों को शब्दों के रंग देकर थोड़ा चटक करने का है। हो सकता है ऐसा करने से धुंधली होने का उनका प्रोसेस शायद थोड़ा धीमा हो जाए और इन शब्दों के रंगों को देख-देख लगने लगे कि यह तस्वीर पुरानी नहीं पड़ेगी। पता नहीं सच में पुरानी नहीं पड़ेगी या मेरी खुशफहमी है, पर करके देखने में क्या जाता है। यह कविता स्मृतियों के साथ इसी खिलवाड़ का नतीजा है जो कल ही इस शक्ल में सामने आई है। कविताएं तो और भी लिखी हैं पर इससे अलग तरह का अपनापन महसूस हुआ है। आपसे शेयर कर रहा हूं... इसी बहाने अपनी स्मृतियों को टटोलना चाहें तो टटोल लीजिए :

सपने में एक रास्ता जाना पहचाना नजर आया
टेढ़ी मेढ़ी गलियों के बीचों बीच बेतरतीब बहती काली गंदी नालियां
कई साल से गड़े खूंटों पर बंधी गोबर से सनी भैंसें और उनकी कटिया
आवारा बीमार आलसी कुत्तों की पूंछ खींचते नंगे पुंगे बच्चों का शोर
कपड़े धोने वाली थापी और प्लास्टिक की बॉल से क्रिकेट खेलते किशोर
उधड़ी हुई ईंटों वाली गलियों में सब्जी बेचते चेहरे में छिपी उदासियां
घरों के बाहर सीढ़ी पर बैठी बूढ़ी चाचियां, ताइयां और मासियां
और फिर नजर आया
चर्र की आवाज से खुलने वाला घिसी हुई चौखट से लटका हुआ किवाड़
टूटी हुई अंगीठी पर कालिख से मोटा हो चुका पानी गर्म करने का भगोना
पुराने कपड़ों को गूंथ कर बनी रस्सी पर सूखता गीला तौलिया और बनियान
दीवार पर ढिठाई से गढ़ी कील पर लटकती कचरी की सूखी माला
टूटे हुए शीशे के टुकड़े, खाली कांच की बोतलें और एक टूटा हुआ मग
सब के सब कुछ जाने पहचाने से
जाना पहचाना सा ही था कड़ी वाली छत पर टूटी खिड़की वाला चौबारा
और चौबारे में रखी पुरानी सीनरियां, कांसे की टोकनी और टूटा टेबल लैंप
वहीं रखे हुए थे हाथ से लिखे नोट्स के जिरोक्स, फटे हुए रजिस्टर और उदास किताबें
रसोई में रखी रहने वाली जाली जिसमें मां नमक मिर्च की शीशियां रखती थीं
और इससे पहले कि कुछ और नजर आता नजर आ गई एक तस्वीर
मकड़ी के जालों में छिपी कन्वोकेशन गाउन वाले हंसते हुए लड़के की तस्वीर
आखिरी दिन कॉलेज ग्राउंड की रेत पर बड़े चाव से खिंचवाई थी
पर अब अकेली है बाकी धूल में सनी पुरानी ग्रुप फोटुओं के साथ
हंसता हुआ चेहरा भर था इसमें, पर हंसती नजर नहीं आ रही थी
पता नहीं क्यों
घर पर घर बदल जाते हैं दौड़ती भागती जिंदगी में
पर घर नहीं बदलता,
और
ना ही बदलती हैं उसे छोड़ जाने की मजबूरियां।

Friday, February 8, 2013

मेरा सफर


मेरे कुछ और शे'र। अक्टूबर और नवंबर 11 के दरम्यान अक्सर घर जाते वक्त कैब में लिखे। अलग-अलग दिन अलग-अलग मिजाज की अपनी उस तस्वीर को आज भी इन शे'रों में साफ देख लेता हूं। हालांकि बदलते वक्त में अपनी ही तस्वीर अक्सर पराई लगने लगती है। फिर भी.... खैर... कुछ शेर आपसे शेयर करता हूं...


तेरे सफर से जुदा है सफर मेरा
तुझे थकने का इंतजार, मुझे चलने की जुस्तजू।

23 अक्टूबर-11

मंजिलें चूमेंगी कदम, रास्ते मुसकाएंगे
राहों को तन्हा न रखना, फासले मिट जाएंगे।

23 अक्टूबर-11

मुस्कुराहटों का दामन थामे रखना
राह में दुश्वारियां हैं बहुत

29 अक्टूबर-11

तेरी छुअन से महके थे जो फूल, सूख भी गए तो क्या
मेरे ख्यालों से तेरी खुश्बू कभी मिट ना पाएगी।

30 अक्टूबर-11

जिंदगी की फिक्रें बड़ी बेरहम होती हैं,
बचपन को मसल देती हैं किसी फूल की तरह।

2 नवंबर-11

उनकी इस अदा का कोई इल्म नहीं था
देखा इक नजर और सब लूट ले गए

2 नवंबर-11

बदलना मौसम का मिजाज है, हवाओं की शरारत नहीं
ये तो खुशबुओं की सौदागर हैं, कभी इधर की कभी उधर की

3 नवंबर-11

Tuesday, December 25, 2012

मैं और तुम

कुहू की बरसात की उस बूंद के जमीन पर गिरकर एक पत्ते को मायूस कर देने के दो तीन दिन बाद ही बर्फ के ये सुनहरे कण मेरे जेहन पर बरस पड़ेंगे, इसका अंदाजा मुझे नहीं था। अंकी ने वट्स ऐप पर जब इस कविता को पेस्ट किया था तो फोन वैसे ही बजा था जैसे दूसरे मैसेज आने पर बजता है, लेकिन उस बजने और इस बजने में फर्क था। इस बार बजकर वह मैसेज टोन तो शांत हो गई, पर मेरे अंदर कुछ वायब्रेट हुआ था। भइया, ये पॉइम पढ़ो, अंकी ने कहा। मैंने इस पीडीएफ के डाउनलोड होने का इंतजार किया और रोमन लिपि में लिखी इस कविता को पढऩे लगा। लाइन दर लाइन, मेरे अंदर की वाइब्रेशन बढ़ती चली गई और जब यह पढ़कर खत्म की तो लगा ठंडी हवाएं मेरे गर्म कपड़ों से कह रही थीं, तुम किसी काम के नहीं। मेरा अंकी से पहला सवाल था, किसने लिखी है। जवाब मिला स्वाति ने। कौन स्वाति। .... मेरी दोस्त है। इंग्लिश पढ़ाती है। हम्म्....। मैंने कुछ वाक्य इस कविता पर डिस्कशन में बिताए और पूछा, इसे अपने ब्लॉग पर लगा सकता हूं क्या। अंकी ने कहा, लगा लीजिए।
इस कविता के बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता। मैं चाहता हूं इस ठंडक के अंदर की गर्माहट आप खुद महसूस करें।
मेरी क्रिसमस।


मैंने बर्फ देखी है तो सिर्फ
रुपहले पर्दे पर गिरते हुए
या किताबों, अखबारों के
बेजान पन्नों पर
बर्फ को कभी छुआ नहीं मैंने
कभी पिघली नहीं वो मेरे हाथों में

हां, इतना पढ़ा है जरूर
कि बर्फ के कोई भी दो कण
एक से नहीं होते
अब्र से गिरते हैं
और समा जाते हैं
गर्द में

मैंने बर्फ को देखा है सिर्फ
पर कभी जाना नहीं
कुछ लम्हों के खेल की
इस सर्द जिंदगी में
कहीं मैं और तुम
बर्फ के ये टुकड़े तो नहीं

-स्वाति


Friday, December 21, 2012

उन्हें जाने दीजिए....


आना जाना जीवन का दस्तूर है। अक्सर रिश्तों का भी। पाने और पाकर खोने के अहसास से शायद ही कोई बचा हो। यही शाश्वत सत्य है, और इसे कोई टाल नहीं सकता। लेकिन यह जानते हुए भी अक्सर इसे नकार देने का मन करता है। एक दबी दबी सी गूंज मन में भटकती रहती है... उसे जाना था तो फिर आया क्यों? उसे खोना था तो पाया क्यों? उसका साथ कुछ और देर नहीं ठहर सकता था क्या? कुछ और दूर वह साथ नहीं चल सकता था क्या?
बिखरना ही होता है तो क्यों सिमट जाते हैं कुछ पल। हमारे भीतर। और फिर ठहरे रहते हैं कुछ लम्हे, बिखर जाने के बहुत देर बात तक। सरासर असंभव दिखता है पर फिर भी लगता रहता है कि शायद कहीं फिर से सिमट जाएं वे बिखरे हुए पल। नहीं सिमटते। सिमटना नहीं होता उन्हें, क्योंकि बिखरना उनकी नियती है। नियती है तो फिर अफसोस क्यों? जितने दिन साथ रहे, उन पलों को क्यों न जी भर जिएं। क्योंकि वे चले भी गए तो क्या... कुछ और पल हैं जो आने के इंतजार में हैं.... उन्हें जाने दीजिए.... उन्हें आने दीजिए। कूहू की इस कविता की तरह... जो कल से घूम रही है मेरे जेहन में... जिसे ब्लॉग पर उतारने को उतावला हूं मै.... थैंक्स कूहू....

दूर तक आसमान नीला और धुला था
जिस वक्त सुबह ने आंखें खोलीं
घरों की मुंडेरों ने बताया... कुछ देर पहले बारिश हुई थी


किसी पत्ते पर ठहरी थी खूबसूरत बूंद
इंद्रधनुष की गोलाई लिए....धीरे से आगे बढ़ी
पत्ता हिला था हल्का सा... या उसका दिल धड़का था?


बूंद बही अपनी निशानी छोड़कर,
आखिरी सिरे पर जा टिकी...
फिर कहां रुकने वाली थी वो चंचल बूंद


पत्ता झुककर देखता रहा धरती की ओर...
मिट्टी में उसको मिलते हुए
पत्ते और भी थे शाख पर, सब चुप रहे
ये खेल देखकर हवा भी देर तक थमी रही


बारिश के बाद यही होता है अक्सर
ये जीवन का चक्र कहां रुकता है
हवा का नर्म झौंका है...
पत्ते ने मुस्कुराकर आसमान को देखा
सावन है...बारिश फिर होगी...


-कुहू

Saturday, October 27, 2012

भले ही अब हम ऑफिस जाने लगे हैं


बातों बातों में कितनी खूबसूरत बातें सामने आ जाती हैं, पहले से पता नहीं होता। कुछ देर काम से खाली हुआ तभी फेसबुक पर गुंजन जैन ने पिंग किया। गुंजन ने आईआईएमसी से जर्नलिज्म किया है और एनबीटी में काम कर रही हैं। इधर-उधर की बात से घूमते-घुमाते उसने बताया कि उसे लिखना भी अच्छा लगता है, मगर दिल से। मैंने कहा कुछ सुनाओ तो उसने अपनी दो तीन रचनाएं लिख दीं। वाकई बेहद खूबसूरत अंदाज है। मैंने गुंजन से पूछा इनमें से एक ले लूं? तो उसने कहा, ले लो। तो आप भी पढि़ए और बताइए कैसी लगी।

भले ही अब हम ऑफिस जाने लगे हैं
पर आज भी
बस या ट्रेन में चढ़ते ही खिड़की वाली सीट कब्जाना,
ऑफिस से निकलते वक़्त सर्द रातों में मुंह से धुआं उड़ाना,
गाड़ियों पर जमी ओस पर उंगली से अपना नाम लिखना,
आसमान के फ्रेम में बादलों से अलग-अलग तस्वीरें बनाना,
अब भी कभी-कभी चॉकलेट के लिए मचलकर मम्मी पापा से जिद करना,
कोई तो है जो हमसे ये करवाता है,
जो तन्हाई में भी हमें गुदगुदाता है,
अकेलेपन में चेहरे पर मुस्कराहट लाता है,
दिल में बैठा वो बच्चा हमसे आज भी नादान शरारतें करवाता है,
और
इस समझदार दुनिया में मासूमियत को खोने नहीं देता

Saturday, October 20, 2012

जो कहा नहीं वो सुना करो



बशीर बद्र की एक खूबसूरत गजल कई दिन से ड्राफ्ट में रखी थी। इसके कई शेर ऐसे हैं जिन्होंने बशीर को एक तरह से अमर कर दिया। बच्चे बच्चे की जुबान पर यह शेर रहे हैं। अगर मुझे ठीक से याद है तो 11-12 साल पहले बशीर बद्र ने एक मुशायरे में बताया था कि यह जो कोई हाथ भी ना मिलाएगा वाला शेर है, इसे मिस यूनिवर्स का खिताब जीतने से पहले सुष्मिता सेन ने मंच पर सुनाया था। मुझे पहले से यह शेर याद था, लेकिन जब बशीर ने यह बात बताई, तब तो यह और खास लगने लगा। आप भी पढि़ए यह गजल.... अच्छी लगेगी






यूं ही बेसबब ना फि‍रा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची कि‍ताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी ना मि‍लाएगा, जो गले मि‍लोगे तपाक से
ये नए मि‍ज़ाज़ का शहर है, ज़रा फा़सले से मि‍ला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हे जि‍सने दि‍ल से भुला दि‍या, उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार सी लगती हैं, ये मुहब्बतों की कहानि‍यां
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

कभी हुस्न-ए-पर्दा नशीं भी हो, ज़रा आशि‍काना लि‍बास में
जो मैं बन संवर के कहीं चलूं, मेरे साथ तुम भी चला करो

ये ख़ि‍ज़ां की ज़र्द शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

नहीं बेहि‍ज़ाब वो चांद सा, कि‍ नज़र का कोई असर नहीं
उसे तुम यूं गर्मी-ए-शौक से, बड़ी देर तक ना तका करो

Saturday, October 13, 2012

फितरत


कभी कभी कुछ पुराने शेर पोस्ट करने की कोशिश करूंगा। फिलहाल ये दो। पिछले साल अक्टूबर में लिखे थे।

बड़ी देर से उलझा हूं अंधेरों के बीच,
आ भी जाओ के रोशन हो जाए राह मेरी


रोशनी का जिक्र क्या, जलने की फिक्र क्या,
जलना तो आखिर फितरत है चरागों की





Friday, June 22, 2012

वो पुराना बक्सा

प्लास्टिक की पाइप में भरा चूरन याद है? और सरकंडे के आगे कागज की चक्करी लगाकर गली-गली दौडऩा? याद होगा। नहीं याद तो याद कीजिए स्कूल में रिसेस से पहले ही चुपके से टिफिन खोलना और अचार के साथ एक परांठा खा लेना। या फिर वो पहली पेंटिंग जिसे बनाकर अपने कमरे की एक दीवार पर सेलो टेप से चिपकाया था। ज्येमेट्री बॉक्स में रखे वो हरे पत्ते जिनके बारे में पूछने पर हम बताते थे कि यह विद्या का पौधा है, साथ रखो तो पढ़ाई अच्छी आती है। मुझे आज यह सब याद आ रहा है। और भी बहुत कुछ याद आ रहा है। जैसे वो कटी पतंग लूटने के लिए ऊंची दीवारों से छलांग लगा देना। और वो दस पैसे की दो रोचक (हाजमोला) की गोलियां। बचपन की इन खट्टी-मीठी यादों में झांकने की वजह है एक कविता। कुछ दिन पहले ऑफिस में गुंजन में अपनी फेसबुक फ्रेंड प्रतीक्षा पांडे की इस कविता को लाइक किया था। फिर एक एक कर सबको इसे पढ़वाया। इस कविता को पढ़ते ही तय किया कि इसे ब्लॉग पर डालूंगा। लेकिन 10 दिन से वक्त नहीं मिल पाया। आज मौका मिलते ही आप तक इसे पहुंचा रहा हूं... उम्मीद है पसंद आएगी।

मां

जब वो पुराना बक्सा खाली करना

तो ध्यान से देखना

उस गहरे हरे रंग के बैग

और सफेद कवर वाली रजाई के बीच

परतों में मुड़ी हुई

एक याद रखी होगी

मिलेगा एक फटा हुआ पन्ना चंपक का

ऊपर भोलू भालू लिए खड़ा होगा

मेरी प्लास्टिक की गेंद

शायद निकले एक दुलहन की तरह सजी हुई गुडिय़ा

जिसकी एक आंख गायब होगी

और बाल बिखर गए होंगे

एक ज्योमेट्री बॉक्स भी होगा

अंडरटेकर के स्टिकर के साथ

और एक वॉटर कलर पेंटिंग

जिस पर सूरज मुस्कुराता होगा

सुनो आहिस्ता खींचना इन्हें

वरना कुछ कंचे गिरकर बिखर जाएंगे

और उसके ऊपर फिसलकर भाग जाएगा

बीता हुआ वक्त

तुम चेल्पार्क की इंक से

नोट कर लेना हर एक सामान

अपने मन के उन पीले पन्नों पर

जिन्हें तुम बंद करके भूल गईं

पुरानी अठन्नियों सा फिजूल न होने देना

तुम याद का हर वह टुकड़ा

जो फेनोप्थेलीन की गोलियों सा महकता

उस पुराने बक्से में रखा है

Sunday, October 16, 2011

खुशी

1 सितंबर 2008 को खुशी पर एक स्पेशल पेज निकालते वक्त मैंने लिखा था...
खुशी और जिंदगी का रिश्ता एक दूसरे की उम्र जितना लंबा होता है। बिना खुशी जिंदगी जिंदगी नहीं और जिंदगी नहीं तो कुछ भी नहीं। इंसान सारी जिंदगी खुशी पाने के लिए ही भागता है। .... दरअसल, खुशियां समेटने की यह जो दौड है, वह ही जीवन है। यह सफर ही जिंदगी का सफर है। खुशियां समेटते जाएं तो बहुत छोटा और छोडते जाएं तो बहुत लंबा!

आज करीब 6 महीने बाद जब ब्लॉग पर यह पोस्ट डालने बैठा तो एक हादसा हो गया। दोस्त सुमन ने पानी का जग स्विच बोर्ड के पास रखा और अचानक स्विच आफ हो गया। जो लिखा था सब उड गया। यह पहली बार नहीं था इसलिए इस बार उतना बडा झटका नहीं लगा। दुबारा लिखने का हौसला करके इसे लिख दिया। पोस्ट का विषय भी कुछ ऐसा ही था। दरअसल, नीचे जो आपको पढवा रहा हूं वह साइकॉलजी की दुनिया की सबसे मशहूर प़त्रिका साइकॉलजी एंड लाइफ का एक एडिटोरियल है जो कुछ साल पहले पढा था। फोंट की कुछ दिक्कत की वजह से ढ और ड के नीचे बिंदी नहीं लगा पा रहा, असुविधा के लिए माफ कीजिएगा! उम्मीद है यह ए​डिटोरियल आपके भी किसी सवाल का जवाब खोजने में मदद करेगा।

प्रसन्नता प्राय: गर्मियों के मौसम की हवा जैसी सुखद होती है, वह न सूचना देकर आती है और न ही सूचना का कोई संकेत जाते हुए देती है। हमें चाहिए कि हम सदैव इसके स्वागत के लिए तैयार रहें, मगर ऐसी इच्छा न करें कि वह हमेशा हमें ही सुख देती रहे। इसके साथ ही यदि हम निराशा और असफलता की शीत हवा को सहन करना भी सीख जाएंगे और अगर हमारे अंदर यह भाव भी कायम रहेगा कि हम किसी प्रकार के निराशजनक व्यवहार को, असफलता और ऐसा ही और भी बहुत कुछ सहन कर सकते हैं तो समझ लीजिए भविष्य में हम और भी प्रसन्नता प्राप्त करने योग्य हो जाएंगे। अगर हम चाहें कि इस जीवन में हमें अंतहीन प्रसन्नता प्राप्त हो जाए तो हमारी इस इच्छा की पूर्ति असंभव है। जीवन में अगर हम कुछ इच्छा कर सकते हैं तो वह यह कि हमें प्रसन्नता का हमारा हिस्सा प्राप्त होता रहे, बस।

Monday, May 16, 2011

साहि‍ल कि‍धर गए?

12 मार्च 2010 को बस में एफएम सुनते हुए एक ग़ज़ल सुनी थी। बहुत प्यारी लगी थी। तब एक कागज़ के टुकड़े पर नोट कर ली थी। आज एक डायरी खोली तो उसमें यह दि‍खी। टाइम मि‍ल गया था इसे ब्लॉग पर डालने का, तो बि‍ना कि‍सी भूमि‍का के इसे पोस्ट कर रहा हूं। उलझनों, शि‍कायतों और ऐसे ही दूसरे अहसासों के लबरेज इस ग़ज़ल को पढ़कर आपको भी अच्छा लगेगा। इसे कि‍सने लि‍खा, काफी कोशि‍श के बाद भी पता नहीं चल सका। आप में से कि‍सी को इसकी जानकारी मि‍ले तो प्लीज मुझे बताएं।

जब वो मेरे करीब से हंसकर गुज़र गए
कुछ ख़ास दोस्तों के भी चेहरे उतर गए

अफसोस डूबने की तमन्ना ही रह गई
तूफान ज़िंदगी में जो आए गुज़र गए

हालांकि‍ उनको देख कर पलटी ही थी नज़र
महसूस ये हुआ के जमाने गुज़र गए

कोई हमें बताए कि‍ हम क्‍या जवाब दें
मंज़र ये पूछते हैं कि‍ साहि‍ल कि‍धर गए।

Monday, April 11, 2011

उसे भूलने की दुआ करो

बशीर बद्र की एक गज़ल दो तीन दिन पहले ध्यान आई थी। कुछ ऐसा हुआ था कि इसका शे,र बार-बार जेहन में कौंध रहा था। शे,र कुछ इस तरह है... अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा, तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो। - शायद ही कोई हो, जिसे किसी ने या जिसने किसी को भुलाया न हो। चाहे चाहकर या ना चाहकर। वैसे भी यह जाहिर सी बात है कि जिंदगी की राह में लोगों के आने-जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है... कभी रुकता नहीं। लेकिन जब किसी का जाना चुभने लगता है, तो ये बातें अतार्किक लगने लगती हैं। तब यह समझ नहीं आता कि कैसे कोई आकर चला गया। तब तो सवाल ही सवाल घेरे रहते हैं कि किसी को आना था तो गया क्यूं या किसी को जाना था तो आया क्यूं। खैर, आपके या मेरे सोचने से कुछ होना नहीं है। जिसने आना होता है, वो आता है और जिसे जाना होता है वो चला जाता है। आपके मुखातिब वह गज़ल है, जिसके कुछ शे,र विश्वप्रसिद्ध हैं।

यूं ही बेसबब ना फि‍रा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची कि‍ताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी ना मि‍लाएगा, जो गले मि‍लोगे तपाक से
ये नए मि‍ज़ाज़ का शहर है, ज़रा फा़सले से मि‍ला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हे जि‍सने दि‍ल से भुला दि‍या, उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार सी लगती हैं, ये मुहब्बतों की कहानि‍यां
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

कभी हुस्न-ए-पर्दा नशीं भी हो, ज़रा आशि‍काना लि‍बास में
जो मैं बन संवर के कहीं चलूं, मेरे साथ तुम भी चला करो

ये ख़ि‍ज़ां की ज़र्द शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

नहीं बेहि‍ज़ाब वो चांद सा, कि‍ नज़र का कोई असर नहीं
उसे तुम यूं गर्मी-ए-शौक से, बड़ी देर तक ना तका करो

Thursday, March 3, 2011

लड़की

पांच महीने से ज्यादा हो गए इस बार ब्लॉग पर आए। मैं खुद हैरान हूं। इस बात से नहीं कि इतना टाइम हो गया उस ब्लॉग पर लिखे, जिसे मैंने अपने आप से बातचीत का आइना समझकर शुरू किया था। ज्यादा हैरानी इस बात से है कि एक ही ढर्रे पर कैसे इतने वक्त तक चला जा सकता है! एक जैसी दिनचर्या, मगर अपने लिए वक्त नहीं! खैर, आज अचानक ख्याल आया कि ब्लॉग तो देख लूं। तभी पद्म सिंह के दो कमेंट्स भी नज़र आए। निदा फाज़ली की एक नज़्म ‘फूल जब खिल के बहक जाता है’ के बारे में उन्होंने अपनी जिन भावनाओं का इज़हार किया, वह दिल को छू गईं। किसी नज़्म की किसी के जीवन में ऐसी भी कद्र होती है, इसे मैं समझ सकता हूं। बस, पढ़ते-पढ़ते लगा कि आज कुछ शेयर किया जाए। तभी वह बुक हाथ आ गई, जिसका जिक्र मैंने पद्म के कमेंट के रिप्लाई में किया है। इसमें एक नज्म है ‘सोने से पहले’। मुझे बहुत अच्छी लगती है। निदा ने इसमें ‘हर लड़की’ के बारे में लिखा है। पता नहीं कौन इसे कितना समझता होगा, लेकिन अक्सर मुझे लगता है कि इच्छाओं का दबाना और समझौतों को इज्जत देने की मुद्रा में उनके आगे नत मस्तक हो जाना ज्यादातर लड़कियों का स्वभाव बन जाता है। यह उनकी मजबूरी होती है या कुछ और मुझे नहीं पता, लेकिन सोचता हूं इच्छाओं को दबाने से ज्यादा तकलीफदेय क्या होता होगा? बेशक वक्त बदल रहा है। लड़कियों के लिए भी। लेकिन कुछ चीजें अब भी नहीं बदलीं, और समझौतों से लड़कियों को जोड़ा जाना उन्हीं में से है। समझौते करते बेशक लड़के भी हों, पर कुछ मामलों में वे उतने नहीं लगते जितने लड़कियों को करने पड़ते रहे हैं.... खैर, आप यह नज़्म पढि़ए


हर लड़की के
तकिये के नीचे
तेज़ ब्लेड
गोंद की शीशी
और कुछ तस्वीरें होती हैं
सोने से पहले
वो कई तस्वीरों की तराश-खऱाश से
एक तस्वीर बनाती है
किसी की आंखें किसी के चेहरे पर लगाती है
किसी के जिस्म पर किसी का चेहरा सजाती है
और जब इस खेल से ऊब जाती है
तो किसी भी गोश्त-पोश्त के आदमी के साथ
लिपट कर सो जाती है


फोटो- गूगल से साभार