Friday, February 8, 2013

मेरा सफर


मेरे कुछ और शे'र। अक्टूबर और नवंबर 11 के दरम्यान अक्सर घर जाते वक्त कैब में लिखे। अलग-अलग दिन अलग-अलग मिजाज की अपनी उस तस्वीर को आज भी इन शे'रों में साफ देख लेता हूं। हालांकि बदलते वक्त में अपनी ही तस्वीर अक्सर पराई लगने लगती है। फिर भी.... खैर... कुछ शेर आपसे शेयर करता हूं...


तेरे सफर से जुदा है सफर मेरा
तुझे थकने का इंतजार, मुझे चलने की जुस्तजू।

23 अक्टूबर-11

मंजिलें चूमेंगी कदम, रास्ते मुसकाएंगे
राहों को तन्हा न रखना, फासले मिट जाएंगे।

23 अक्टूबर-11

मुस्कुराहटों का दामन थामे रखना
राह में दुश्वारियां हैं बहुत

29 अक्टूबर-11

तेरी छुअन से महके थे जो फूल, सूख भी गए तो क्या
मेरे ख्यालों से तेरी खुश्बू कभी मिट ना पाएगी।

30 अक्टूबर-11

जिंदगी की फिक्रें बड़ी बेरहम होती हैं,
बचपन को मसल देती हैं किसी फूल की तरह।

2 नवंबर-11

उनकी इस अदा का कोई इल्म नहीं था
देखा इक नजर और सब लूट ले गए

2 नवंबर-11

बदलना मौसम का मिजाज है, हवाओं की शरारत नहीं
ये तो खुशबुओं की सौदागर हैं, कभी इधर की कभी उधर की

3 नवंबर-11

Tuesday, December 25, 2012

मैं और तुम

कुहू की बरसात की उस बूंद के जमीन पर गिरकर एक पत्ते को मायूस कर देने के दो तीन दिन बाद ही बर्फ के ये सुनहरे कण मेरे जेहन पर बरस पड़ेंगे, इसका अंदाजा मुझे नहीं था। अंकी ने वट्स ऐप पर जब इस कविता को पेस्ट किया था तो फोन वैसे ही बजा था जैसे दूसरे मैसेज आने पर बजता है, लेकिन उस बजने और इस बजने में फर्क था। इस बार बजकर वह मैसेज टोन तो शांत हो गई, पर मेरे अंदर कुछ वायब्रेट हुआ था। भइया, ये पॉइम पढ़ो, अंकी ने कहा। मैंने इस पीडीएफ के डाउनलोड होने का इंतजार किया और रोमन लिपि में लिखी इस कविता को पढऩे लगा। लाइन दर लाइन, मेरे अंदर की वाइब्रेशन बढ़ती चली गई और जब यह पढ़कर खत्म की तो लगा ठंडी हवाएं मेरे गर्म कपड़ों से कह रही थीं, तुम किसी काम के नहीं। मेरा अंकी से पहला सवाल था, किसने लिखी है। जवाब मिला स्वाति ने। कौन स्वाति। .... मेरी दोस्त है। इंग्लिश पढ़ाती है। हम्म्....। मैंने कुछ वाक्य इस कविता पर डिस्कशन में बिताए और पूछा, इसे अपने ब्लॉग पर लगा सकता हूं क्या। अंकी ने कहा, लगा लीजिए।
इस कविता के बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता। मैं चाहता हूं इस ठंडक के अंदर की गर्माहट आप खुद महसूस करें।
मेरी क्रिसमस।


मैंने बर्फ देखी है तो सिर्फ
रुपहले पर्दे पर गिरते हुए
या किताबों, अखबारों के
बेजान पन्नों पर
बर्फ को कभी छुआ नहीं मैंने
कभी पिघली नहीं वो मेरे हाथों में

हां, इतना पढ़ा है जरूर
कि बर्फ के कोई भी दो कण
एक से नहीं होते
अब्र से गिरते हैं
और समा जाते हैं
गर्द में

मैंने बर्फ को देखा है सिर्फ
पर कभी जाना नहीं
कुछ लम्हों के खेल की
इस सर्द जिंदगी में
कहीं मैं और तुम
बर्फ के ये टुकड़े तो नहीं

-स्वाति


Friday, December 21, 2012

उन्हें जाने दीजिए....


आना जाना जीवन का दस्तूर है। अक्सर रिश्तों का भी। पाने और पाकर खोने के अहसास से शायद ही कोई बचा हो। यही शाश्वत सत्य है, और इसे कोई टाल नहीं सकता। लेकिन यह जानते हुए भी अक्सर इसे नकार देने का मन करता है। एक दबी दबी सी गूंज मन में भटकती रहती है... उसे जाना था तो फिर आया क्यों? उसे खोना था तो पाया क्यों? उसका साथ कुछ और देर नहीं ठहर सकता था क्या? कुछ और दूर वह साथ नहीं चल सकता था क्या?
बिखरना ही होता है तो क्यों सिमट जाते हैं कुछ पल। हमारे भीतर। और फिर ठहरे रहते हैं कुछ लम्हे, बिखर जाने के बहुत देर बात तक। सरासर असंभव दिखता है पर फिर भी लगता रहता है कि शायद कहीं फिर से सिमट जाएं वे बिखरे हुए पल। नहीं सिमटते। सिमटना नहीं होता उन्हें, क्योंकि बिखरना उनकी नियती है। नियती है तो फिर अफसोस क्यों? जितने दिन साथ रहे, उन पलों को क्यों न जी भर जिएं। क्योंकि वे चले भी गए तो क्या... कुछ और पल हैं जो आने के इंतजार में हैं.... उन्हें जाने दीजिए.... उन्हें आने दीजिए। कूहू की इस कविता की तरह... जो कल से घूम रही है मेरे जेहन में... जिसे ब्लॉग पर उतारने को उतावला हूं मै.... थैंक्स कूहू....

दूर तक आसमान नीला और धुला था
जिस वक्त सुबह ने आंखें खोलीं
घरों की मुंडेरों ने बताया... कुछ देर पहले बारिश हुई थी


किसी पत्ते पर ठहरी थी खूबसूरत बूंद
इंद्रधनुष की गोलाई लिए....धीरे से आगे बढ़ी
पत्ता हिला था हल्का सा... या उसका दिल धड़का था?


बूंद बही अपनी निशानी छोड़कर,
आखिरी सिरे पर जा टिकी...
फिर कहां रुकने वाली थी वो चंचल बूंद


पत्ता झुककर देखता रहा धरती की ओर...
मिट्टी में उसको मिलते हुए
पत्ते और भी थे शाख पर, सब चुप रहे
ये खेल देखकर हवा भी देर तक थमी रही


बारिश के बाद यही होता है अक्सर
ये जीवन का चक्र कहां रुकता है
हवा का नर्म झौंका है...
पत्ते ने मुस्कुराकर आसमान को देखा
सावन है...बारिश फिर होगी...


-कुहू

Saturday, October 27, 2012

भले ही अब हम ऑफिस जाने लगे हैं


बातों बातों में कितनी खूबसूरत बातें सामने आ जाती हैं, पहले से पता नहीं होता। कुछ देर काम से खाली हुआ तभी फेसबुक पर गुंजन जैन ने पिंग किया। गुंजन ने आईआईएमसी से जर्नलिज्म किया है और एनबीटी में काम कर रही हैं। इधर-उधर की बात से घूमते-घुमाते उसने बताया कि उसे लिखना भी अच्छा लगता है, मगर दिल से। मैंने कहा कुछ सुनाओ तो उसने अपनी दो तीन रचनाएं लिख दीं। वाकई बेहद खूबसूरत अंदाज है। मैंने गुंजन से पूछा इनमें से एक ले लूं? तो उसने कहा, ले लो। तो आप भी पढि़ए और बताइए कैसी लगी।

भले ही अब हम ऑफिस जाने लगे हैं
पर आज भी
बस या ट्रेन में चढ़ते ही खिड़की वाली सीट कब्जाना,
ऑफिस से निकलते वक़्त सर्द रातों में मुंह से धुआं उड़ाना,
गाड़ियों पर जमी ओस पर उंगली से अपना नाम लिखना,
आसमान के फ्रेम में बादलों से अलग-अलग तस्वीरें बनाना,
अब भी कभी-कभी चॉकलेट के लिए मचलकर मम्मी पापा से जिद करना,
कोई तो है जो हमसे ये करवाता है,
जो तन्हाई में भी हमें गुदगुदाता है,
अकेलेपन में चेहरे पर मुस्कराहट लाता है,
दिल में बैठा वो बच्चा हमसे आज भी नादान शरारतें करवाता है,
और
इस समझदार दुनिया में मासूमियत को खोने नहीं देता

Saturday, October 20, 2012

जो कहा नहीं वो सुना करो



बशीर बद्र की एक खूबसूरत गजल कई दिन से ड्राफ्ट में रखी थी। इसके कई शेर ऐसे हैं जिन्होंने बशीर को एक तरह से अमर कर दिया। बच्चे बच्चे की जुबान पर यह शेर रहे हैं। अगर मुझे ठीक से याद है तो 11-12 साल पहले बशीर बद्र ने एक मुशायरे में बताया था कि यह जो कोई हाथ भी ना मिलाएगा वाला शेर है, इसे मिस यूनिवर्स का खिताब जीतने से पहले सुष्मिता सेन ने मंच पर सुनाया था। मुझे पहले से यह शेर याद था, लेकिन जब बशीर ने यह बात बताई, तब तो यह और खास लगने लगा। आप भी पढि़ए यह गजल.... अच्छी लगेगी






यूं ही बेसबब ना फि‍रा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची कि‍ताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी ना मि‍लाएगा, जो गले मि‍लोगे तपाक से
ये नए मि‍ज़ाज़ का शहर है, ज़रा फा़सले से मि‍ला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हे जि‍सने दि‍ल से भुला दि‍या, उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार सी लगती हैं, ये मुहब्बतों की कहानि‍यां
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

कभी हुस्न-ए-पर्दा नशीं भी हो, ज़रा आशि‍काना लि‍बास में
जो मैं बन संवर के कहीं चलूं, मेरे साथ तुम भी चला करो

ये ख़ि‍ज़ां की ज़र्द शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

नहीं बेहि‍ज़ाब वो चांद सा, कि‍ नज़र का कोई असर नहीं
उसे तुम यूं गर्मी-ए-शौक से, बड़ी देर तक ना तका करो

Saturday, October 13, 2012

फितरत


कभी कभी कुछ पुराने शेर पोस्ट करने की कोशिश करूंगा। फिलहाल ये दो। पिछले साल अक्टूबर में लिखे थे।

बड़ी देर से उलझा हूं अंधेरों के बीच,
आ भी जाओ के रोशन हो जाए राह मेरी


रोशनी का जिक्र क्या, जलने की फिक्र क्या,
जलना तो आखिर फितरत है चरागों की





Friday, June 22, 2012

वो पुराना बक्सा

प्लास्टिक की पाइप में भरा चूरन याद है? और सरकंडे के आगे कागज की चक्करी लगाकर गली-गली दौडऩा? याद होगा। नहीं याद तो याद कीजिए स्कूल में रिसेस से पहले ही चुपके से टिफिन खोलना और अचार के साथ एक परांठा खा लेना। या फिर वो पहली पेंटिंग जिसे बनाकर अपने कमरे की एक दीवार पर सेलो टेप से चिपकाया था। ज्येमेट्री बॉक्स में रखे वो हरे पत्ते जिनके बारे में पूछने पर हम बताते थे कि यह विद्या का पौधा है, साथ रखो तो पढ़ाई अच्छी आती है। मुझे आज यह सब याद आ रहा है। और भी बहुत कुछ याद आ रहा है। जैसे वो कटी पतंग लूटने के लिए ऊंची दीवारों से छलांग लगा देना। और वो दस पैसे की दो रोचक (हाजमोला) की गोलियां। बचपन की इन खट्टी-मीठी यादों में झांकने की वजह है एक कविता। कुछ दिन पहले ऑफिस में गुंजन में अपनी फेसबुक फ्रेंड प्रतीक्षा पांडे की इस कविता को लाइक किया था। फिर एक एक कर सबको इसे पढ़वाया। इस कविता को पढ़ते ही तय किया कि इसे ब्लॉग पर डालूंगा। लेकिन 10 दिन से वक्त नहीं मिल पाया। आज मौका मिलते ही आप तक इसे पहुंचा रहा हूं... उम्मीद है पसंद आएगी।

मां

जब वो पुराना बक्सा खाली करना

तो ध्यान से देखना

उस गहरे हरे रंग के बैग

और सफेद कवर वाली रजाई के बीच

परतों में मुड़ी हुई

एक याद रखी होगी

मिलेगा एक फटा हुआ पन्ना चंपक का

ऊपर भोलू भालू लिए खड़ा होगा

मेरी प्लास्टिक की गेंद

शायद निकले एक दुलहन की तरह सजी हुई गुडिय़ा

जिसकी एक आंख गायब होगी

और बाल बिखर गए होंगे

एक ज्योमेट्री बॉक्स भी होगा

अंडरटेकर के स्टिकर के साथ

और एक वॉटर कलर पेंटिंग

जिस पर सूरज मुस्कुराता होगा

सुनो आहिस्ता खींचना इन्हें

वरना कुछ कंचे गिरकर बिखर जाएंगे

और उसके ऊपर फिसलकर भाग जाएगा

बीता हुआ वक्त

तुम चेल्पार्क की इंक से

नोट कर लेना हर एक सामान

अपने मन के उन पीले पन्नों पर

जिन्हें तुम बंद करके भूल गईं

पुरानी अठन्नियों सा फिजूल न होने देना

तुम याद का हर वह टुकड़ा

जो फेनोप्थेलीन की गोलियों सा महकता

उस पुराने बक्से में रखा है

Sunday, October 16, 2011

खुशी

1 सितंबर 2008 को खुशी पर एक स्पेशल पेज निकालते वक्त मैंने लिखा था...
खुशी और जिंदगी का रिश्ता एक दूसरे की उम्र जितना लंबा होता है। बिना खुशी जिंदगी जिंदगी नहीं और जिंदगी नहीं तो कुछ भी नहीं। इंसान सारी जिंदगी खुशी पाने के लिए ही भागता है। .... दरअसल, खुशियां समेटने की यह जो दौड है, वह ही जीवन है। यह सफर ही जिंदगी का सफर है। खुशियां समेटते जाएं तो बहुत छोटा और छोडते जाएं तो बहुत लंबा!

आज करीब 6 महीने बाद जब ब्लॉग पर यह पोस्ट डालने बैठा तो एक हादसा हो गया। दोस्त सुमन ने पानी का जग स्विच बोर्ड के पास रखा और अचानक स्विच आफ हो गया। जो लिखा था सब उड गया। यह पहली बार नहीं था इसलिए इस बार उतना बडा झटका नहीं लगा। दुबारा लिखने का हौसला करके इसे लिख दिया। पोस्ट का विषय भी कुछ ऐसा ही था। दरअसल, नीचे जो आपको पढवा रहा हूं वह साइकॉलजी की दुनिया की सबसे मशहूर प़त्रिका साइकॉलजी एंड लाइफ का एक एडिटोरियल है जो कुछ साल पहले पढा था। फोंट की कुछ दिक्कत की वजह से ढ और ड के नीचे बिंदी नहीं लगा पा रहा, असुविधा के लिए माफ कीजिएगा! उम्मीद है यह ए​डिटोरियल आपके भी किसी सवाल का जवाब खोजने में मदद करेगा।

प्रसन्नता प्राय: गर्मियों के मौसम की हवा जैसी सुखद होती है, वह न सूचना देकर आती है और न ही सूचना का कोई संकेत जाते हुए देती है। हमें चाहिए कि हम सदैव इसके स्वागत के लिए तैयार रहें, मगर ऐसी इच्छा न करें कि वह हमेशा हमें ही सुख देती रहे। इसके साथ ही यदि हम निराशा और असफलता की शीत हवा को सहन करना भी सीख जाएंगे और अगर हमारे अंदर यह भाव भी कायम रहेगा कि हम किसी प्रकार के निराशजनक व्यवहार को, असफलता और ऐसा ही और भी बहुत कुछ सहन कर सकते हैं तो समझ लीजिए भविष्य में हम और भी प्रसन्नता प्राप्त करने योग्य हो जाएंगे। अगर हम चाहें कि इस जीवन में हमें अंतहीन प्रसन्नता प्राप्त हो जाए तो हमारी इस इच्छा की पूर्ति असंभव है। जीवन में अगर हम कुछ इच्छा कर सकते हैं तो वह यह कि हमें प्रसन्नता का हमारा हिस्सा प्राप्त होता रहे, बस।

Monday, May 16, 2011

साहि‍ल कि‍धर गए?

12 मार्च 2010 को बस में एफएम सुनते हुए एक ग़ज़ल सुनी थी। बहुत प्यारी लगी थी। तब एक कागज़ के टुकड़े पर नोट कर ली थी। आज एक डायरी खोली तो उसमें यह दि‍खी। टाइम मि‍ल गया था इसे ब्लॉग पर डालने का, तो बि‍ना कि‍सी भूमि‍का के इसे पोस्ट कर रहा हूं। उलझनों, शि‍कायतों और ऐसे ही दूसरे अहसासों के लबरेज इस ग़ज़ल को पढ़कर आपको भी अच्छा लगेगा। इसे कि‍सने लि‍खा, काफी कोशि‍श के बाद भी पता नहीं चल सका। आप में से कि‍सी को इसकी जानकारी मि‍ले तो प्लीज मुझे बताएं।

जब वो मेरे करीब से हंसकर गुज़र गए
कुछ ख़ास दोस्तों के भी चेहरे उतर गए

अफसोस डूबने की तमन्ना ही रह गई
तूफान ज़िंदगी में जो आए गुज़र गए

हालांकि‍ उनको देख कर पलटी ही थी नज़र
महसूस ये हुआ के जमाने गुज़र गए

कोई हमें बताए कि‍ हम क्‍या जवाब दें
मंज़र ये पूछते हैं कि‍ साहि‍ल कि‍धर गए।

Monday, April 11, 2011

उसे भूलने की दुआ करो

बशीर बद्र की एक गज़ल दो तीन दिन पहले ध्यान आई थी। कुछ ऐसा हुआ था कि इसका शे,र बार-बार जेहन में कौंध रहा था। शे,र कुछ इस तरह है... अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा, तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो। - शायद ही कोई हो, जिसे किसी ने या जिसने किसी को भुलाया न हो। चाहे चाहकर या ना चाहकर। वैसे भी यह जाहिर सी बात है कि जिंदगी की राह में लोगों के आने-जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है... कभी रुकता नहीं। लेकिन जब किसी का जाना चुभने लगता है, तो ये बातें अतार्किक लगने लगती हैं। तब यह समझ नहीं आता कि कैसे कोई आकर चला गया। तब तो सवाल ही सवाल घेरे रहते हैं कि किसी को आना था तो गया क्यूं या किसी को जाना था तो आया क्यूं। खैर, आपके या मेरे सोचने से कुछ होना नहीं है। जिसने आना होता है, वो आता है और जिसे जाना होता है वो चला जाता है। आपके मुखातिब वह गज़ल है, जिसके कुछ शे,र विश्वप्रसिद्ध हैं।

यूं ही बेसबब ना फि‍रा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची कि‍ताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी ना मि‍लाएगा, जो गले मि‍लोगे तपाक से
ये नए मि‍ज़ाज़ का शहर है, ज़रा फा़सले से मि‍ला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा कोई जाएगा
तुम्हे जि‍सने दि‍ल से भुला दि‍या, उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार सी लगती हैं, ये मुहब्बतों की कहानि‍यां
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

कभी हुस्न-ए-पर्दा नशीं भी हो, ज़रा आशि‍काना लि‍बास में
जो मैं बन संवर के कहीं चलूं, मेरे साथ तुम भी चला करो

ये ख़ि‍ज़ां की ज़र्द शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

नहीं बेहि‍ज़ाब वो चांद सा, कि‍ नज़र का कोई असर नहीं
उसे तुम यूं गर्मी-ए-शौक से, बड़ी देर तक ना तका करो

Thursday, March 3, 2011

लड़की

पांच महीने से ज्यादा हो गए इस बार ब्लॉग पर आए। मैं खुद हैरान हूं। इस बात से नहीं कि इतना टाइम हो गया उस ब्लॉग पर लिखे, जिसे मैंने अपने आप से बातचीत का आइना समझकर शुरू किया था। ज्यादा हैरानी इस बात से है कि एक ही ढर्रे पर कैसे इतने वक्त तक चला जा सकता है! एक जैसी दिनचर्या, मगर अपने लिए वक्त नहीं! खैर, आज अचानक ख्याल आया कि ब्लॉग तो देख लूं। तभी पद्म सिंह के दो कमेंट्स भी नज़र आए। निदा फाज़ली की एक नज़्म ‘फूल जब खिल के बहक जाता है’ के बारे में उन्होंने अपनी जिन भावनाओं का इज़हार किया, वह दिल को छू गईं। किसी नज़्म की किसी के जीवन में ऐसी भी कद्र होती है, इसे मैं समझ सकता हूं। बस, पढ़ते-पढ़ते लगा कि आज कुछ शेयर किया जाए। तभी वह बुक हाथ आ गई, जिसका जिक्र मैंने पद्म के कमेंट के रिप्लाई में किया है। इसमें एक नज्म है ‘सोने से पहले’। मुझे बहुत अच्छी लगती है। निदा ने इसमें ‘हर लड़की’ के बारे में लिखा है। पता नहीं कौन इसे कितना समझता होगा, लेकिन अक्सर मुझे लगता है कि इच्छाओं का दबाना और समझौतों को इज्जत देने की मुद्रा में उनके आगे नत मस्तक हो जाना ज्यादातर लड़कियों का स्वभाव बन जाता है। यह उनकी मजबूरी होती है या कुछ और मुझे नहीं पता, लेकिन सोचता हूं इच्छाओं को दबाने से ज्यादा तकलीफदेय क्या होता होगा? बेशक वक्त बदल रहा है। लड़कियों के लिए भी। लेकिन कुछ चीजें अब भी नहीं बदलीं, और समझौतों से लड़कियों को जोड़ा जाना उन्हीं में से है। समझौते करते बेशक लड़के भी हों, पर कुछ मामलों में वे उतने नहीं लगते जितने लड़कियों को करने पड़ते रहे हैं.... खैर, आप यह नज़्म पढि़ए


हर लड़की के
तकिये के नीचे
तेज़ ब्लेड
गोंद की शीशी
और कुछ तस्वीरें होती हैं
सोने से पहले
वो कई तस्वीरों की तराश-खऱाश से
एक तस्वीर बनाती है
किसी की आंखें किसी के चेहरे पर लगाती है
किसी के जिस्म पर किसी का चेहरा सजाती है
और जब इस खेल से ऊब जाती है
तो किसी भी गोश्त-पोश्त के आदमी के साथ
लिपट कर सो जाती है


फोटो- गूगल से साभार

Wednesday, September 22, 2010

हमें फिर चाहिए वैसी ही मुहब्बत

ब्लॉग पर आए बहुत दिन हो गए। व्यस्तताओं ने नहीं आने दिया। बहुत मन था निदा फाजली का कुछ शेयर करने का। उनके लि‍खे इस आर्टिकल को आखिर आज ब्लॉग तक लाने में कामयाब हो गया। ज्यादा कुछ कहे बगैर इसे आप तक ला रहा हूं। इतना जरूर है कि 4 जुलाई 2007 को इसे जब दैनिक भास्कर के संपादकीय पन्ने पर पढ़ा था तो इसे सहेजने में एक मिनट भी नहीं लगा। मुहब्बत पर इतनी बारीक और संवदेनशील नजर सीधे दिल तक दस्तक देती है। आप भी पढि़ए

अक्सर प्रेमी जोड़े पति-पत्नी बनने के बाद प्रेमी नहीं रहते, खरीदी हुई जायदाद की तरह एक-दूसरे के मालिक हो जाते हैं। दोनों एक-दूसरे की कानूनी जायदाद होते हैं, जिसमें तीसरे का दाखिला वर्जित होता है, समाज में भी, अदालतों में भी और नैतिकता के ग्रंथों में भी। वह आकर्षण जो शादी से पहले एक-दूसरे के प्रति नजर आता है, कई बार के पहने हुए वस्त्रों की तरह बाद में मद्धिम पड़ता जाता है। मानव के इस मनोविज्ञान से हर घर में शिकायत रहती है। कभी-कभी यह शिकायत मुसीबत बन जाती है। दूरियों से पैदा होने वाला रोमांस जब नजदीकियों के घेरे में आकर हकीकत का रूप धर लेता है तो रिश्तों से सारी चमक-दमक उतार लेता है। इसके बाद न पति आकाश से धरती पर आया उपहार होता है और न पत्नी का प्यार खुदाई चमत्कार होता है... मेरी एक गजल का शे’र है:
देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है, जिससे तेरी सूरत न मिलती...

हिंदी कथाकार शानी की एक कहानी है, जिसका शीर्षक है ‘आंखें’। इसमें ऐसे ही एक प्रेम विवाह में फैलती एकरसता को विषय बनाया गया है। दोनों पति-पत्नी बासी होते रिश्ते को ताजा रखने के लिए कई कोशिशें करते हैं। कभी सोने का कमरा बदलते हैं, कभी एक-दूसरे के लिए गिफ्ट लाते हैं, कभी आधी रात के बाद चलने वाली अंग्रेजी फिल्मों की सीडी चलाते हैं... मगर फिर वही बोरियत... अंत में कथा दोनों को एक पब्लिक पार्क में ले जाती है। दोनों आमने-सामने मौन से बैठे रहते हैं। इस उकताहट को कम करने के लिए पति सिगरेट लेने जाता है। मगर जब वापस आता है तो उसे यह देखकर हैरत होती है कि पत्नी से जरा दूर बैठा एक अजनबी उसकी पत्नी को उन्हीं चमकती आंखों से देख रहा होता है, जिनसे विवाह पूर्व वह कभी उस समय की होने वाली पत्नी को निहारता था। अर्थशास्त्र का एक नियम है : वस्तु की प्राप्ति के बाद वस्तु की कीमत लगातार घटती जाती है। प्यास में पानी का जो महत्व होता है, प्यास बुझने के पश्चात वही पानी उतनी कशिश नहीं रखता। मेरी एक कविता है:
पहले वह रंग थी
फिर रूप बनी
रूप से जिस्म में तब्दील हुई
और फिर...
जिस्म से बिस्तर बनके
घर के कोने में लगी रहती है
जिसको कमरे में घुटा सन्नाटा
वक्त-बेवक्त उठा लेता है
खोल लेता है बिछा लेता है।

बूढ़े गालिब के युग के जवाब शायर दाग देहलवी थे। उनके पिता नवाब शम्सुद्दीन ने ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी को गोली से उड़ा दिया था। नवाब साहब को फांसी दी गई और उनकी पत्नी अपने पांच साल के बेटे को रामपुर में अपनी बहन के हवाले करके, जान बचाने के लिए इधर-उधर भागती रहीं। जहां-जहां उन्हें मदद मिली, वहां-वहां इसकी कीमत उन्हें अपने शरीर से चुकानी पड़ी, जिसके नतीजे में दाग के एक भाई और बहन अंग्रेज नस्ल से भी हुए। यह अभागिन महिला आखिर में, आखिरी मुगल सम्राट के होने वाले जानशीन मिर्जा फखरू की निगाह में आई। यह 1857 से पहले का इतिहास है। महल में आने के बाद मां को रामपुर में छोड़े हुए बेटे की याद आई और किस्मत-बदकिस्मत बेटे को रामपुर से लालकिले में ले आई, 1857 से एक साल पहले मिर्जा फखरू का देहांत हुआ - और उसके बाद मां और बेटा दोनों फिर से बेघर हो गए। दाग उस वक्त 23-24 वर्ष के थे... वह शायर बन चुके थे - मशहूर हो चुके थे। शायरी ने उस समय के रामपुर नवाब को उन पर मेहरबान बनाया और उन्होंने फिर से घर बसाया... रामपुर में हर साल एक मेला लगता था, जिसमें देश की मशहूर तवायफें अपने गायन और नृत्य का प्रदर्शन करती थीं, उन तवायफों में एक नवाब साहब के भाई की मंजूरेनजर (प्रेमिका) थी। दाग का दिल उसी पर आ गया। उसका नाम था मुन्नीबाई हिजाब। दिल की दीवानगी में अक्ल शामिल नहीं होती।
इस दीवानगी में वह घर से बेघर भी हो सकते थे - जान भी खतरे में पड़ सकती थी, लेकिन मुहब्बत की दीवानगी, पत्नी के मना करने के बावजूद, उनसे नवाब साहब के नाम एक खत लिखवा देती है। खत में लिखा गया था, ‘नवाब साहब आपको खुदा ने हर खुशी से नवाजा है, मगर मेरे लिए सिर्फ एक ही खुशी है और वह है मुन्नीबाई...।’ नवाब, दाग की शायरी के प्रशंसक थे... उन्होंने मुन्नीबाई के द्वारा ही उत्तर भिजवाया। उत्तर में लिखा था - दाग साहब, हमें आपकी गजल से ज्यादा मुन्नीबाई अजीज नहीं हैं। मुन्नीबाई दाग साहब की प्रेमिका के रूप में उनके साथ रहने लगी, लेकिन जब मन में धन का प्रवेश हुआ तो मन बेचारा बंजारा बन गया और मुन्नीबाई उन्हें छोड़ कर चली गई - दाग का शे’र है:
तू जो हरजाई है अपना भी यही तौर सही
तू नहीं और सही और नहीं, और सही...

यूरोप में रिश्तों की इस उकताहट को कॉनजुगल बोरडम कहते हैं - पति-पत्नी के संबंध की इस तब्दीली ने ही कोठों या तवायफ की संस्कृति को जन्म दिया था। कुछ साल पहले तक पत्नी के होते हुए किसी वेश्या से संबंध रखने को बुरा नहीं समझा जाता था। इस्मत चुगताई ने इस परंपरा के विरोध में ‘लिहाफ’ नामक कहानी लिखी, जिसमें पत्नी का एकांत उसे लेसबियन बना देता है। देश-विदेश की जितनी भी बड़ी प्रेम कथाएं हैं, जिन पर महान काव्यों की रचना हुई है, उनमें कोई कथा पति-पत्नी के पात्रों में नजर नहीं आती। हीर-रांझा हो, लैला-मजनू हो, सोहनी-महिवाल हो या शीरी-फरहाद, इन सबका अंत मिलन पर नहीं, वियोग पर होता है। मुगल शासनकाल में केवल दो अपवाद नजर आते हैं - एक जहांगीर और नूरजहां का प्यार... और दूसरा खुर्रम और अरजुमन्द बानो का प्रेम, लेकिन जहांगीर और उसके सुपुत्र शाहजहां के इश्क में एक अंतर भी है - नूरजहां शेर अफगन की पत्नी थी, जो बाद में जहांगीर की मलिका बनी। नूरजहां से जहांगीर की कोई संतान भी नहीं है।
खुर्रम (जो बादशाह बन कर शाहजहां के नाम से जाने जाते हैं) और अरजुमन्द (जो बाद में मुमताज महल बनी) का इश्क भी पति-पत्नी का इश्क है, लेकिन वह शाहजहां के 13 बच्चों की मां बनकर भी बरकरार रहा। यह प्रेम संसार का एक अजूबा है, मुमताज महल का निधन चौहदवें बच्चे के जन्म के समय हुआ था। वह बुरहानपुर में मरी थी। वहीं उन्हें दफन भी किया गया था, लेकिन मरी हुई मुमताज से शाहजहां की मुहब्बत को मौत भी खत्म नहीं कर पाई। वह मुमताज की कब्र को भी अपने करीब ही रखना चाहता था। इसीलिए उसे बुरहानपुर में उसकी कब्र से निकलवा कर जमना के किनारे ताजमहल में दोबारा सुलाया गया...। औरंगजेब ने जब शाहजहां को कैद कर लिया था तो वह कैदखाने की एक खिड़की से मुमताज के ताजमहल को ही देखा करता था, शाहजहां और मुमताज जैसी मुहब्बत की आज हमारे संसार को ज्यादा जरूरत है।

फोटो - साभार गूगल

Sunday, July 25, 2010

जो बात खो जाती है ....

मेरा मानना है कि साहित्य का हर हिस्सा कहीं न कहीं अपने आप से बातचीत की ही उपज होता है। कविता को खा़स तौर से मैं इसी नजरिए से देखता हूं। सलिलक्वि की इस खूबसूरत तस्वीर (कभी-कभी नहीं भी) में एक रंग उन बातों का होता है, जो अक्सर हम तक सीमित न रहने की जिद पाल लेती हैं, लेकिन आखिरकार ऐसा कर नहीं पातीं। आसान शब्दों में कहूं तो, वे बातें जो अक्सर जु़बां पर आते-आते कहीं खो जाती हैं। ऐसा नहीं है कि इन खो चुकी बातों का कोई अर्थ नहीं होता। मुझे तो लगता है कि कभी-कभी इनके मायने कही गई बातों से भी ज्यादा होते हैं। कभी-कभी ये इतनी खू़बसूरत होती हैं कि इन्हें याद कर बरबस ही होंठों पर मुस्कान तैर जाती हैं। इन बातों की एक और खा़स बात होती है और यह उन्हें बाकी बातों से अलग करती हैं। जो बातें हम अपने आप से ही करते हैं, अक्सर उनका पता किसी और को नहीं चलता, लेकिन जो बातें जु़बां तक आते आते रुक जाती हैं, अक्सर दूसरे भी उन्हें पढ़ लेते हैं। और वे सदा-सदा के लिए हमारे जेहन में कैद होकर रह जाती हैं। बात कुछ उलझी हुई सी लग सकती है। अगर ठीक से समझा नहीं पाया होऊं, तो माफी चाहूंगा। निदा फाज़ली की एक नज्म़ इस बात को ज्यादा बेहतर ढंग से समझा सकती है। मुझे यह बहुत पसंद है। इसे आपसे शेयर कर रहा हूं। मित्र वरुण वशिष्ठ ने इसके लिए यह खू़बसूरत इलस्ट्रेशन बनाया है।

उसने
अपना पैर खुजाया
अंगूठी के नग को देखा
उठ कर
खाली जग को देखा
चुटकी से एक ति‍नका तोड़ा
चारपाई का बान मरोड़ा
भरे पूरे घर के आंगन में
कभी-कभी वह बात
जो लब तक
आते आते खो जाती है
कि‍तनी सुंदर हो जाती है।




इलस्ट्रेशन : वरुण वशिष्ठ

Monday, June 28, 2010

तो रोने लगती है मां...


बिजी होने के कारण लंबे समय से ब्लॉग पर कुछ नहीं डाल सका। लेकिन ऐसा भी नहीं कि इस दौरान खुद से बातचीत का सिलसिला कभी थमा। उलटा, बातचीत की एक अजीब कड़ी बन गई, जिसका वर्णन अभी शायद ठीक से न कर सकूं। बहरहाल, एक संयोग का जिक्र जरूर करना चाहूंगा। पिछली पोस्ट के बाद सोचा था कि कुछ साल पहले 6 मई को भास्कर के रसरंग में पढी़ एक कविता पोस्ट करूंगा। एक डायरी में नोट वि‍जयशंकर चतुर्वेदी की इस कविता को कंपोज़ करने का वक्त तो तभी मिल गया था, लेकिन उसके बाद से किसी न किसी वजह से इसे लाइव नहीं कर सका। इस करीब एक महीने के दौरान जो कुछ जिया और जो कुछ आसपास देखा, अब लग रहा है कि वह इसी कविता में कहीं छिपा हुआ था। इसे पढ़ता हूं, तो लगता है ज़िंदगी ज़ज्बात का एक दरिया ही तो है। देखने वाले इसे अपनी-अपनी नज़र से देखते हैं। किसी को यह बहता हुआ पानी लगता है, तो किसी को बहा कर ले जाता पानी। हममें से ज्यादातर शायद ऐसे होंगे, जिसे यह देखने की फुर्सत ही न मिलती हो कि ऊपर से बहते दिखते इस पानी के अंदर बहुत कुछ ठहरा हुआ होता है। पानी की यह पर्दादारी हममें से ज्यादातर की ज़िंदगी का हुनर बन चुकी है। ऊपर से बहता हुआ दिखने के लिए हम अपने भीतर ठहरी हुई किसी बूंद को अक्सर छिपाए रखते हैं। बेशक, कुछ ठहरी हुई बूंदें मोती भी बनती हैं, लेकि‍न अक्सर ये बूंदें किसी न किसी ज़ज्बात की अगुवाई करती हुई खुद ही सबके सामने आ जाती हैं। पर्दानशीं अक्सर बेपर्दा हो जाते हैं...



सयाने कह गए हैं
रोने से घटता है मान
गि‍ड़गि‍ड़ाना कहलाता है हाथि‍यों का रोना
फि‍र भी चंद लोग रो-रोकर
काट देते हैं ज़िंदगी
दोस्तों, खुशी में भी अक्सर
नि‍कल जाते हैं आंसू
जैसे कि‍ बहुत दि‍नों के बाद मि‍ली
तो फूट-फूटकर रोने लगी बहन

वैसे भी यहां रोना मना है
पर बताओ तो सही कौन रोता नहीं है?
साहब मारता है, लेकि‍न रोने नहीं देता
कुछ लोग अभि‍नय भी कर लेते हैं रोने का
लेकि‍न मैं जब-जब करता हूं
शादी की चर्चा
तो असल में रोने लगती है बेटी

आसान नहीं है रोना
फि‍र भी खुलकर रो लेता है आसमान
नदि‍यां तो रोती ही रोती हैं
पहाड़ तक रोता है
अपनी किस्मत पर
लेकि‍न बड़ी मुश्किल है
मेरे रोने में
कभी मन ही मन रोता हूं
तो रोने लगती है मां ...



इलस्ट्रेशन : गि‍रीश

Sunday, June 13, 2010

गाल से चि‍पका टेड्डी बियर

कभी-कभी बहुत साधारण से लगने वाले दृश्य भी बहुत गहरा प्रभाव छोड़ देते हैं। आपने गौर किया होगा कि अक्सर कविताओं, गज़लों या साहित्य की अन्य विधाओं में कुछ ऐसे दृश्यों का जिक्र होता है, जो कहने को तो हम रोज देखते हैं, लेकिन उस नज़र से कभी नहीं, जिससे उस कवि या रचनाकार ने उसे देखा होता है। जो कुछ हम अक्सर देखते हैं, उसमें कुछ खोज पाने की गुंजाइश के बारे में कभी सोचते नहीं। शायद इसलिए कि हमें लगने लगता है, मानो ये तो रोज की बात है, इसमें भला ऐसा क्या होगा, जिसे सहेजा जा सके। मेरे साथ तो अक्सर ऐसा होता है। कई बार ऐसी कविताएं या दूसरी चीजें पढऩे को मिल जाती हैं। फिर ख्याल आता है कि साधारण लगने वाले वाकयों को इतनी खूबसूरती से देखने और फिर उससे भी ज्यादा खूबसूरत अंदाज़ में बयान कर देने का हुनर खुदा की नेमत नहीं तो और क्या होगा। करीब 3 साल पहले अनुराग वत्स ने बुक फेयर से लौटकर कुछ पोस्ट कार्ड्स मुझे दिए थे। इन पर विदेश के कुछ कवियों की कविताओं को हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में ट्रांस्लेट करके छापा गया था। इनमें एक कविता लार्श सोबी क्रिस्तेनसेन की थी। सोबी के बारे में बस इतना पता चल सका कि वे नॉर्वे के कवि हैं। काफी कोशिश के बाद भी बहुत ज्यादा पता नहीं चल सका, लेकिन उनकी जो कविता मैं ब्लॉग पर डाल रहा हूं, उसे पढ़कर मुझे लगा था कि कवि कहीं का भी हो, अंदर से एक जैसी प्रवृत्ति का होता है। तभी हम कह देते हैं कि‍ फलां सज्जन कवि हृदय है। इस कविता को पढ़कर शायद आपको भी लगे कि खूबसूरती देखने वाले की नज़रों में होती है।



सेलफोन पकड़े
इतने सारे आदमी
कभी नहीं देखे।
हर कोने पर,
फाटक पर,
बस स्टॉप पर,
कैफेटेरिया में,
पेड़ों के नीचे,
पार्क में।
लगता है
टेड्डी बियर को गाल से चिपकाए,
वे सोच रहे हैं
कि वह उनकी
हर बात समझता है।
किसी से तो
बोल रहे होंगे।
कभी-कभी सोचता हूं,
आपस में तो नहीं बात कर रहे।
हो नहीं सकता,
इतना सुंदर सपना
सच हो नहीं सकता।