
कुछ चीज़ों की भूमिकाएं नहीं होतीं। उन्हें कहने से पहले चुप होना पड़ता है। खामोश।
फरवरी 2008 में लिखे कुछ शब्दों को आज जब पढ़ रहा था, तो यही लगा। हो सकता है अपने ही लिखे इन शब्दों की भूमिका लिख नहीं पा रहा था, इसलिए ऐसा लगा हो। या शायद लगा कि चुपचाप भी तो कुछ कहा जा सकता है।
मित्र गिरीश ने बिना शब्दों के कुछ कहा है इस बारे में। अपने मन से। अपनी कला की ज़ुबान में। आप उसे देख सकते हैं। चाहें तो सुन भी सकते हैं और महसूस भी कर सकते हैं। जिन शब्दों के जरिए मैंने अपनी बात कभी लिखी थी, इस इलस्ट्रेशन से उसने वह बात कहनी चाही है।
सबका कुछ नाम होता है
तुम्हारा
मेरा
चांद का
नदी का
ज़मीं का
लेकिन पता नहीं क्यों
कभी-कभी लगता है
जिनका नाम नहीं होता
वे भी जीते हैं
हमारे साथ-साथ
हमेशा
जब तक जीते हैं हम
जैसे कुछ रिश्ते
बेनाम
6 comments:
बहुत बढ़िया!
..
हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!
लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.
अनेक शुभकामनाएँ.
हमने देखी है इन आँखों की मँहकती खुशबू
हाथ से छू के इन्हें रिश्तों का इलज़ाम न दो.
riste bahut se jite hain benam.....
aur bhi hain jo hain benam.....aur sabse prabhavi par unhe janta koi nahi bas mahsus karte hain
हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें
thnx...
arre wah tum to poet bhi ho...good...keep it up
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